
Eco Sensitive Zone
राजसमंद. केंद्र सरकार ने राजस्थान के कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के आसपास के क्षेत्र को पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर दिया है। यह अधिसूचना 16 जनवरी को भारत के राजपत्र (असाधारण) में प्रकाशित की गई है। इस अधिसूचना के तहत अभयारण्य की सीमा से शून्य से एक किलोमीटर तक का क्षेत्र इको-सेंसिटिव ज़ोन माना जाएगा। कुल 243 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र इको-सेंसिटिव ज़ोन में शामिल किया गया है। ये क्षेत्र राजसमंद, पाली और उदयपुर जिलों के हिस्सों को कवर करता है। इस जोन में तीनों जिलों के कुल 94 गांव इसके अधीन आ रहे हैं।
सरकार ने अधिसूचना में स्पष्ट किया है कि कुंभलगढ़ अभयारण्य अरावली पर्वतमाला के सबसे नाज़ुक पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है। यह क्षेत्र थार मरुस्थल और अरावली के जंगलों के बीच एक प्राकृतिक अवरोध बनाता है, जो मरुस्थलीकरण को आगे बढ़ने से रोकता है। अभयारण्य का पूर्वी भाग बनास नदी का उद्गम क्षेत्र माना जाता है, जबकि पश्चिमी ढलानों से बहने वाली नदियां लूनी नदी तंत्र का हिस्सा बनती हैं। इस कारण यह क्षेत्र दो प्रमुख जलग्रहण प्रणालियों के बीच विभाजन रेखा भी बनाता है।
केंद्र सरकार का मानना है कि कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के चारों ओर इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित करना अरावली क्षेत्र, वन्यजीवों और जल स्रोतों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए आवश्यक है। यह निर्णय आने वाले वर्षों में क्षेत्र की पारिस्थितिकी को स्थायी रूप से सुरक्षित रखने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।
कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य:
इको-सेंसिटिव ज़ोन का कुल क्षेत्रफल 243 वर्ग किलोमीटर निर्धारित किया है। उत्तर दिशा में रावली-टोडगढ़ वन्यजीव अभयारण्य से सटी सीमा के कारण इको-सेंसिटिव ज़ोन की चौड़ाई शून्य किलोमीटर रखी गई है, जबकि अन्य सभी दिशाओं में यह एक किलोमीटर तक फैला है।
अधिसूचना में कहा गया है कि कुंभलगढ़ क्षेत्र: अरावली के पहाड़ी जंगलों और थार मरुस्थल के बीच पारिस्थितिकी सेतु का काम करता हैकुंभलगढ़ की पहाड़ियां मरुस्थलीकरण को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकने वाला प्राकृतिक अवरोध हैं। पूर्वी ढलानों से बनास नदी का उद्गम होता है, जो बंगाल की खाड़ी में गिरती है। पश्चिमी ढलानों से बहने वाली सुकड़ी, मिठड़ी, सुमेर और कोट नदियाँ लूनी नदी तंत्र का हिस्सा बनती हैं, जो अंततः अरब सागर में मिलती हैं।
स्तनधारी, तेंदुआ, धारीदार लकड़बग्घा, जंगली बिल्ली, भारतीय पैंगोलिन, भारतीय लोमड़ी, नीलगाय, सांभर, सियार, भारतीय साही, छोटा सिवेट, पक्षी, भारतीय मोर, पेंटेड फ्रैंकोलिन, ग्रे फ्रैंकोलिन, कॉमन क्वेल, रेन क्वेल, बटन क्वेल, रूडी शेल्डक, गडवाल, कॉमन टील, गागनी जैसी जलपक्षी प्रजातियां अधिसूचना में दर्ज हैं।
खैर, रोहिड़ा, बबूल की विभिन्न प्रजातियां, धोकड़ा, नीम, आंवला, सेमल, शीशम, अर्जुन, करंज, ढाक, काजू, इमली सहित अनेक औषधीय और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण पौधे।
सशर्त अनुमति वाले कार्य
कोटडा, पोखरिया, दुदालिया, वरदादा, कलथाना, उदावद, सियान, ओगलाट, कंबोला, अरेटा की भागल, कादियान, कुंभलगढ़ किला, बीड़ की भागल, केलवाड़ा, अंथडों की भागल, नया खेड़ा, सुजा कलेवा, गंवार, बहेता की भागल, निचला घाटड़ा, उपरी घाटड़ा, रूपनगर, सकरियो की भागल, आंवली की भागल, पुठिया, घरतलाई, कोयला, भीलो की तलाई, भीलों की भागल, उमरवास, तेजों का गुड़ा, केसा गुडा, बाबाजी कीआसन, आसन, दरड़ा, भगवानपुरा, माडा की बस्सी, पिपरेलु, खेड़ा जस्सा, सतपालिया, दिवेर, फूटिया संवेदी जोन में आने वाले गांव हैं। इसमें कुंभलगढ़ और भीम क्षेत्र के गांवों की संख्या 42 है।
केन्द्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण व वन्य जीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इको सेंसिटिव जोन घोषित किया है। अब इसमें कुछ चीजों पर अनुमति रहेगी और कुछ चीजों पर पूर्णत प्रतिबंध रहेगा। कलक्टर की अध्यक्षता में गठित होने वाली कमेटी। इस जोन पर विशेष नजर रखेगी। कुंभलगढ़ अभ्यारण्य के एक किमी क्षेत्र को इको सेंसिटिव जोन घोषित किया है।
रामानंद भाकर, डीएफओ, राजसमंद
Published on:
18 Jan 2026 12:20 pm

