
राजसमंद @ पत्रिका. निजी स्कूल संचालक अभिभावकों से बसों का मनमानी किराया तो लेते हैं, लेकिन सुरक्षा और सुविधा राम भरोसे हैं। अधिकांश संचालकों ने पुराने व कंडम वाहन खरीद रखे हैं, कुछ संचालकों ने तो बसों की जगह ऑटो लगा और मारुति वैन लगा रखी है, जिनमें बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है। जबकि वर्ष २०१४, २०१६ तथा २०१७ में निजी स्कूल की बसें पलट चुकी हैं। जिसमें २०१७ में चारभुजा क्षेत्र पलटी बस से एक बच्चे की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि 10 से अधिक घायल हो गए थे, लेकिन उसके बावजूद न तो विद्यालय सतर्क हुए और न ही जिला प्रशासन। जिसके चलते आज भी बिना फिटनेस की बसों का खुले आम संचालन हो रहा है।
मूक दर्शक बना प्रशासन
नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो गया लेकिन अभीतक स्कूल संचालक वही अनफिट बसों का संचालन कर रहे हैं। इनके पास न तो नियमानुरूप फिटनेस सर्टिफिकेट है न आपात स्थिति से निपटने के लिए फस्र्ट एड बॉक्स व अग्निशमन यंत्र लगे हैं। गंभीर बात यह है कि अफसर भी जानते हैं कि इन कंडम बसों के संचालन से नौनिहालों की जान संकट में पड़ सकती है फिर भी वह मूक दर्शक बने हैं।
जाली तक नहीं लगी
कई स्कूल बसों में काले कांच लगे हैं, जबकि गाइड लाइन के तहत शीशे पारदर्शी होने चाहिए। बस के दोनों साइड जाली लगाने का प्रावधान है, ताकि खिडक़ी से बच्चे शरीर का कोई अंग बाहर न निकाल सकें। ड्राइवर-कंडक्टर का नाम पीछे लिखा होना चाहिए।
रंग में भी बरत रहे लापरवाही
जिले में कई निजी स्कूल ऐसे हैं जिन्होंने अपने स्कूल की बसों को पीला रंग तक नहीं पुतवाया है। जबकि कोर्ट के साफ आदेश हैं कि स्कूल बसों का रंग पीला ही होना चाहिए।
बसों में यह खामियां
- नियम अनुरूप फिटनेस सर्टीफिकेट नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के अनुसार बसों में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे हैं।
-कई स्कूल बसों के पीछे इमरजेंसी नंबर नहीं हैं।
-कुछ स्कूलों में अटैच बसें संचालित की जा रही हैं। जिनसे बच्चों को लाने ले जाने के अलावा अन्य उपयोग लिया जाता है।
- कंडम बसों में स्पीड गवर्नर नहीं है।
- इमरजेंसी विंडो भी गायब है।
- फस्र्ट एड बॉक्स की सुविधा नहीं।
ठूंस-ठूंस कर भरते हैं बच्चे
जिले में प्रारंभिक व माध्यमिक शिक्षा के अंतर्गत ५३८ से अधिक निजी स्कूलों का संचालन हो रहा है। इसमें से कई शिक्षण संस्थानों में छात्र छात्राओं को घर से लाने व लेजाने के लिए कई जगह बसें हैं तो कई जगह ऑटो, टेम्पो का संचालन किया जा रहा है। 52 सीट बसों में जबरन व नियम विरूद्ध ९० तक छात्र- छात्राएं भरे जाते हैं।
सफर कम-ज्यादा, किराया एक
स्कूल संचालकों द्वारा चलाई जा रही निजी बसों में सभी छात्रों का किराया फिक्स है, जबकि कोई छात्र मात्र एक किमी ही बस में सफर करता है। और कोई ५ से ७ किमी। ऐसे में पास से जाने वाले बच्चों को यह किराया काफी महंगा पड़ता है।
Published on:
15 Apr 2018 11:24 am
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