
आप भी पन्नालाल की तरह बन सकते हैं देसी-विदेशी परिन्दों के दोस्त
रांची(रवि सिन्हा): कल्पना कीजिए आप के आस-पास तरह-तरह के सुंदर-आकर्षक पक्षियों का झुंड है। आप उनकी अठखेलियां देख रहें हैं, नए तरह के स्वर सुन रहे हैं। आपका मन हो रहा है कि काश इन परिन्दों को पास बुलाएं और उनसे बात करें। यह असंभव नहीं है। आपकी लगन और धैर्य से यह संभव है कि आप देसी-विदेशी परिन्दों ( Domestic Foreign Birds) को अपना मित्र बना सकते हैं। वे एक इशारे में आपकी तरफ खिंचे चले आएंगे। आपकी हथेली पर, सिर पर और कंधों पर बैठ जाएंगे। आपको अपनी भाषा में अपना हालचाल बताएंगे। जी हां यह सब देखने-सुनने में अटपटा लग सकता है किन्तु इसे पन्नालाल महतो ( Birdman Panna lal ) ने सही साबित कर दिखाया है। झारखंड के रामगढ़ जिले के सरइयां कुंदरू गांव के रहने वाले पन्नालाल की करीब तीस तरह की देसी-विदेशी प्रजाति के पक्षियों से दोस्ती है। उसकी एक आवाज में परिन्दों का झुंड इस तरह खिंचा चला आता है मानों उनकी ही प्रजाति का कोई परिन्दा उन्हें बुला रहा हो।
30 प्रजाति के पक्षियों से है याराना
कौआ, कोयल, मोर, ग्रेटर कॉकल, ग्रे पैटरिज, बर्वक फेंकोविन, रेडिस सेव, कबूतर, पड़की, तोता, जंगली मुर्गी, मालाबार ड्रोगन सहित करीब तीस प्रजाति के पक्षियों से पन्नालाल की खूब यारी जमती है। पन्नालाल बर्डमैन पिछले दस सालों से पक्षी संरक्षण पर काम कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से वह रांची के अनगड़ा स्थित सिकिदिरी घाटी जंगल, हुंडरू व बनादाग जंगल में पक्षी पर रिसर्च कर रहे हैं। पन्नालाल झारखंड में पाई जाने वाली करीब तीस किस्म के पक्षियों से उसी की भाषा में बातचीत करते हैं। उनके संरक्षण का प्रयास करते हैं। नजर रखते हैं कि कोई उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाए।
पक्षियों से बात कर जानते हैं उनका हाल
पक्षियों के साथ रहकर पन्ना यह तक जान लेते हैं कि उसका मूड क्या है, वह कहना क्या चाहता है। वह अपने साथ एक बैग लेकर चलते हैं। इसमें पक्षी का दाना और इनके इलाज की कुछ दवाइयां होती हैं। कभी-कभी तो पन्नालाल पक्षी से बातचीत करते हुए उसे पकड़ लेते हैं और कुछ अध्ययन करने के बाद उसे फिर से छोड़ देते हैं। पेशे से किसान पन्ना अपनी आय का एक हिस्सा प्रतिमाह पक्षी संरक्षण के लिए दे रहे हैं।
हमेशा हरे रंग की ड्रेस पहनते है पन्नालाल
करीब तीस साल के पन्नालाल महतो हमेशा हरे रंग की ड्रेस पहनते हैं। यहां तक की जूता व टोपी भी हरे रंग की होती है। ऐसा इसलिए ताकि जरूरत पडऩे पर जंगलों में घंटों एक ही जगह पर रहा जा सके। पन्नालाल बताते हैं, मैं लगातार सीखने का काम कर हूं। ज्यादा से ज्यादा पक्षियों की जिंदगी के बारे में जानना चाहता हूं।
Published on:
04 Feb 2020 07:14 pm

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