
नीमच. मालवा माटी के सपूत प्रख्यात साहित्यकार एवं राजनेता बालकवि बैरागी का रविवार शाम निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। बालकवि बैरागी रविवार दोपहर में नीमच में एक पेट्रोल पंप के उद्घाटन समारोह में पहुंचे, जहां उनका भाषण भी हुआ। इसके बाद वह गृह नगर मनासा लौटे और शाम 4.30 बजे परिजन उन्हें चाय के लिए उठाया तो आंखें खुली ही नहीं। देश का निडर साहित्यकार और फक्कड़ राजनेता हमेशा के लिए अलविदा कह गया। उनका जाना स्वच्छ राजनीति और दमदार साहित्य जगत में हमेशा के लिए खाली स्थान छोड़ गया। 10 फरवरी 1931 को अविभाजित मंदसौर जिले में जन्म के बाद उनकी प्रारंभिक शिक्षा रामपुरा में ही हुई। निर्धन परिवार में जन्मे बैरागी बचपन से प्रतिभाशाली थे। उज्जैन से उन्होंने हिंदी साहित्य में स्नातक और स्नातकोत्तर किया। बालकवि बैरागी की प्रारंभिक रचनाएं मालवी बोली में थी। पहली बार काव्यपाठ 1953 में तराना में किया। उनकी प्रमुख रचनाएं पणिहारिन, लखारा, बादरवा अईग्या रे, मारो केलुआ रो टापरो देश विदेश में चर्चित हुई।
वाशिंगटन डीसी एवं लंदन से मालवी रचनाओं का प्रसारण हुआ। नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में बैरागी जी ने महादेवी वर्मा, डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन के साथ कविता पाठ किया। अपने जीवनकाल में उन्होने 11 में से 5 विश्व हिंदी सम्मेलनों में अध्यक्षता करने की। बालकवि बैरागी की प्रमुख पुस्तकों में चटक म्हारा चंपा, मैं उपस्थित हूं यहां, बिजुका बाबू, मनुहार भाभी, दरद दीवानी, जूझ रहा है हिंदुस्तान, ललकार, भावी रक्षक देश के, रेत के रिश्ते , वंशज का वक्तव्य आदि प्रमुख हैं। उन्होंने १० से अधिक फिल्मों के गीतों की रचना की। उनका अंतिम संस्कार सोमवार को किया जाएगा।
शांत हो गई देशराग की युवा ललकार
म ध्य प्रदेश के पश्चिमी सिरे पर बसे मनासा को बालकवि ने अंतरराष्ट्रीय पहचान दी है - राजनीति की कर्मभूमि और साहित्य की धर्म भूमि के रूप में। राजनीति ने उन्हें भोपाल और दिल्ली में नवाजा, तो साहित्य की मंचीय पुकार ने उन्हें कालजयी बना दिया। मैंने उनकी कविता पनिहारिन सुनी 'मोटी मोटी आंखां में नानो नानो काजर, आंखां लागे नवी नवी तो लगा कि ये श्रृंगार के कवि हैं। उन दिनों हिंदी कविता की पनिहारिनें फिल्मी हिरोइनों पर भी भारी पड़ती थीं। बीएल आच्छा बताते हैं कि बालकवि की हड्डियों का फास्फोरस युवा पीढ़ी और युद्ध के मोर्चों पर चमका तो युवाओं में उफान सा आ गया। भला हो स्वर्गीय मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू का कि वे धापूबाई द्वारिका दास बैरागी के बेटे नंदरामदास को सदा सर्वदा के लिए बालकवि नाम दे गये। चार-पांच साल की अवस्था में भीख का कटोरा थामने वाले और 23 बरस तक जूता न पहनने वाले इस कवि में वो आह्वान गमकता है कि मुख्यमंत्री काटजू 45 मिनट के भाषण में से 40 मिनट बालकवि को गाने के लिए मजबूर करते हैं। 5 मिनट में अपना भाषण खत्म कर देते हैं। बालकवि की राजनैतिक यात्रा अपने दम पर है। दो बार विधायक और मध्यप्रदेश शासन में मंत्री पद। लोकसभा और राज्यसभा में सदस्य। कई संसदीय समितियों में सलाहकार और हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं की लड़ाई लडऩे वाले भाषा प्रेमी। पर नैतिक मूल्यों और पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता के सदाबहार राही। साहित्य में न कभी राजनीति की, ना उसका साहित्यिक वर्चस्व के लिए इस्तेमाल किया।
बी एल आच्छा
पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर बताते हैं बाल कवि बैरागी का जीवन एक खुली किताब की तरह रहा, वह जो कहते थे, वैसा करते भी थे। मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री और लोकसभा, राज्यसभा सदस्य रहे बैरागी जी ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। मुझे याद है जब वे लोकसभा सदस्य थे, उस दौरान उन्होंने एक कॉलम शुरू किया। वह प्रत्येक सत्र पर आलेख लिखा करते थे। आलेख का एक-एक शब्द सटीक होता था। इसका संसद की कार्यवाही पर गुणात्मक असर दिखा। उनका मानना था कि राजनीति में हैं तो नेताओं पढऩे लिखने का अभ्यास बनाए रखना चाहिए। वह पढ़ेंगे तो समझेंगे और समझेंगे तो इसका उनके जीवन पर असर दिखेगा। एक संस्मरण आजादी की स्वर्ण जयंती से जुड़ा है। वर्ष 1997 में माखनलाल चतुर्वेदी के समाचार पत्र कर्मवीर का पुन: प्रकाशन शुरू हुआ। इसके राइट्स सप्रे संग्रहालय को मिले। कर्मचारी आजादी के समय का प्रखर समाचार पत्र था। सप्रे संग्रहालय ने माखनलाल जी पंक्तियों के साथ बालकवि बैरागी को शुभकामना संदेश के लिए पत्र लिखा। जबाव में उन्होंने पंक्तियां लिखीं - सिर्फ कलेवर ही बदला है, तेवर इसका वही रहेगा, माखन दादा का जाया है, कर्मवीर युग सत्य कहेगा।
बालकवि ने मालवी को दिलाया देशभर मंे गौरव
दादा बालकवि बैरागी फक्कड़ व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार ही नहीं सफल राजनेता भी थे। उन्होंने शिवमंगलसिंह सुमन, हरिकृष्ण प्रेमी, रामकुमार चतुर्वेदी चंचल, श्रीकृष्ण सरल जैसे ख्यात साहित्यकारों के उत्तरदायित्व का निर्वहन किया। दादा बैरागी ने मालवी बोली को देशव्यापी गौरव दिलाने का जो काम किया वह अनूठा है। मालवी आचंलिक बोली है, इसे देश में सम्मान दिलाना बैरागीजी की क्षमताओं से ही संभव था। वह एेसे कवि थे, जिन्हें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और शिवमंगलसिंह सुमन ने गुरुमंत्र दिया। अपनी बात निडरता से कहना उनकी खासियत थी, इसके सभी कायल थे। अपनी सरकार के खिलाफ बोलने में वह नहीं हिचकते थे। बड़े-बड़े पदों पर रहे, गीतकार, साहित्यकार, रचनाकार, राजनेता रहे, लेकिन उनके चेहरे पर घमंड का भाव नहीं रहा। वह कहते थे, एक भिखारी की संतान हूं और भीख मांगकर ही जीवन शुरू किया। एेसे कर्मशील इंसान का जाना अपूर्णीय क्षति है।
सत्यनारायण सत्तन, कवि, पूर्व विधायक
मंत्री से मंगते तक कृति साफगोई की परिचायक
10 फरवरी 2018 को बालकवि बैरागी के जन्मदिन पर मैंने मनासा फोन कर उन्हें बधाई दी तो वह बोले, अजहर भाई! मैं आपको पत्रिका में निरंतर पढ़ता रहता हूं। 30 अक्टूबर 2017 को शनि ग्रह के धनु राशि में प्रवेश पर आपकी भविष्यवाणियां पढ़ी। ज्योतिष को भगवान तो नहीं मनाता किंतु ज्ञान की विधा है, इसलिए रुचि रखता हूं। मेरी जन्म तिथि 10 फरवरी 1931 है। नीमच के रामपुरा नगर में सुबह 5.३० बजे जन्म हुआ और जन्म नाम नंदरामदास बैरागी है। मैं ननिहाल में जन्मा। बालकवि विशेषण 21 नवंबर 1951 को मनासा में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री डॉ. कैलाशनाथ काटजू ने दिया था। मेरे परिचित बताते हैं मुझ पर शनि की साढ़े साती चल रही है...आशा है आप मुझे कुछ कहेंगे। बैरागीजी की सबसे बड़ी विशेषता रही कि वह फोन या पत्र चाहे किसी का हो, जवाब अवश्य देते थे। यह सीख मुझे उन्होंने २४ मार्च 1976 को चौमहला (राजस्थान) कवि सम्मेलन में दी। मंगते से मंत्री तक की बालकवि की कृति साहस, साफगोई और पारदर्शिता का प्रमाण है। साहित्य के पुरोधा बालकवि बैरागी को श्रद्धांजलि।
प्रो. अजहर हाशमी, कवि और विषय विशेषज्ञ
Published on:
14 May 2018 02:02 pm
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