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अगर संबंध बनाना है तो जीव से बनाओ, अजीव के प्रति मोह मत रखो: प्रियदर्शनश्री महाराज

अगर संबंध बनाना है तो जीव से बनाओ, अजीव के प्रति मोह मत रखो: प्रियदर्शनश्री महाराज

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अगर संबंध बनाना है तो जीव से बनाओ, अजीव के प्रति मोह मत रखो: प्रियदर्शनश्री महाराज

अगर संबंध बनाना है तो जीव से बनाओ, अजीव के प्रति मोह मत रखो: प्रियदर्शनश्री महाराज

रतलाम। साधक जीव और अजीव को जाने और उसके बाद कल्याणकारी मार्ग पर चले । हलन चलन रहित चेतना रहित को अजीव कहते है । जो सडऩे वालाए गलने वाला और नाशवान हो वो पुदगल है । तू जिस शरीर से मोह रखता है वो भी पुदगल है । आपका बन्धन राग जीव से है या अजीव से। बच्चे ने मोबाइल तोड़ दिया तो आप अजीव (मोबाइल) के लिये जीव (बच्चे) को मारते हो । जमीन जायदाद, भूमि, मकान दुकान 'सब अजीवÓ के लिए जीव से झगड़ा करते हो। जीव से जीव की मैत्री होती है। अंतरजातीय विवाह को आप बुरा कहते हो। तो फिर आप जीव होते हुए अजीव से रिश्ता कैसे रख सकते हो। ये भी तो अंतरजातीय विवाह है। अगर संबंध बनाना है तो जीव से बनाओ, अजीव के प्रति मोह मत रखो।
यह विचार गुरुदेव प्रियदर्शन महाराज ने नीमचौक स्थानक पर व्यक्त की। महाराज ने कहा कि जीव के मोटे तौर पर दो भेद है सिध्द और संसारी । जो सारे पाप दोषों को मिटाकर मोक्ष में सिध्द शिला पर विराजमान है वे सिद्ध है । जो होशपूर्वक लिया जाए वो संथारा और जो राग द्वेष या घुटन और क्रोध की बेहोशी में मरे वो आत्म हत्या है । शरीर को कर्म निर्जरा के लिये समर्पित कर देना संथारा है और शरीर को भयंकर वेदना देकर खत्म करना आत्महत्या है। जो मिथ्यावादी है वो दुल्लभबोधी है और जो भगवान की वाणी को मानता है वो वो सुल्लभबोधी है, वीतराग वाणी में जो श्रद्धा रखता है वो पंडित संसारी और जो गुस्से, राग द्वेष से जुड़ा है वो अपण्डित संसारी कहलाता है । ये हमारा सौभाग्य है की हमे परमात्मा के शासन में जीने का मौका मिला है। हमारा कोई कर्म ऐसा नही होना चाहिए जिससे परमात्मा का शासन कमजोर बने। हम हमेशा उनके शासन को आगे बढ़ाने का प्रयास करे।

श्रेणी तप की कठिन तपस्या 20 वर्ष बाद पूरी हो रही
आराधना भवन पोरवाडो के वास पर चातुर्मास हेतु विराजित धर्मरति विजय महाराज, श्रुतोदय विजय महाराज, भाग्यरति विजय महाराज व साध्वी भगवंत दिव्यप्रज्ञा की निश्रा में श्राविका मोहनबाई रखबचंद हरनिया जैन संतनगर की श्रेणी तप की कठिन तपस्या चल रही है । आराधना भवन में 20 वर्ष पश्चात मोहनबाई रखबचंद हरनिया द्वारा यह तपस्या पूर्ण की जा रही हैं । इसके पूर्व करीब 20 वर्ष पहले कनकबेन तेजपाल शाह मुंबई वाला एवं रतनबाई पारख द्वारा श्रेणी तप किया गया था । धर्मरति विजय महाराज ने श्रेणी तप का महत्व बताते हुए कहा कि यह तप लगातार 110 दिन चलता है, जिसमें 83 उपवास व 27 बियासना एक से छह के क्रम में करते हुए सम्पन्न होता है, जो कि 5 नवंबर को पूर्ण होगा।
आराधना भवन ट्रस्ट बोर्ड अध्यक्ष अशोक लुनिया एवं सचिव हिम्मत गेलड़ा द्वारा बताया गया कि तप की अनुमोदना हेतु हरनिया परिवार द्वारा 6 नवंबर को प्रात: 8 बजे गुरुदेव व साध्वीश्री भगवंत की निश्रा में तपस्वी की शोभायात्रा आराधना भवन से निकलेगी जो नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई, उनके निवास स्थान संतनगर पहुंचेगी। जहां गुरुदेव पर प्रवचन होंगे और हरनिया परिवार द्वारा संघ पूजन किया जाएगा। इस अवसर पर आराधना भवन ट्रस्ट बोर्ड व श्रीसंघ द्वारा तपस्वी का बहुमान भी किया जाएगा। इसके एक दिन पूर्व 5 नवंबर को चंद्रवीर परिवार द्वारा संतनगर निवास स्थान पर रात्रि 8.30 बजे से भव्य प्रभु भक्ति भी की जाएगी ।आराधना भवन सेवा समिति अध्यक्ष प्रदीप कटारिया द्वारा समस्त समाजजन से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर धर्मलाभ लेने का आग्रह किया है।