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पेज चार की बाटम- पण आपणा आखा गाम में एक भी चक्की नी है हुजूर!

रतलाम

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Newsdesk

Aug 02, 2026

datia news

datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)

फोटो-आरटी- 0201- डॉ प्रदीपसिंह राव

रतलाम। रियासत काल के दौरान कुछ राजाओं ने तो इतनी प्रसिद्धि पाई कि उन्हें सदियों तक भुलाया न का सकता। इनमें से सज्जनसिंह का नाम अमर है। उन्होंने अपने आदर्श आर्थ हर्बर्ट के रहने के लिए रामबाग में हरबर्ट कोठी के नाम से भवन बनवाया था। इसमें उनके अंग्रेज मित्र और राजसी मेहमान रुका करते थे।आमोद प्रमोद का यह केंद्र था, यहां रुद्राभिषेक की परंपरा थी। फिरंगी भी इसमें रुचि लेते की यह क्या होता है।श्रवण माह में शिवभक्त एकत्र होते और शिवालय पर रुद्राभिषेक होता था। रतलाम के विख्यात ज्योतिष पंडित विनायकलाल जोशी ने इस परंपरा को धरोहर बनाया। राजा सज्जन सिंह का भक्ति भाव शीर्ष पर था। इसी आयोजन में भक्तगणों ने नगर में आटा चक्की की मांग रखी थी।


1905 तक यहां भी आटा चक्की न होने से महल के कोठार का आटा जेल के कैदी पिसते थे। नगर में आम आदमी अपने घरों में पत्थर की चक्कियों में आटा पिसते थे। महिलाओं का यह प्रमुख कार्य था। उसी समय धान मंडी क्षेत्र में एक आटा चक्की शुरू हुई, लेकिन राजमहल के अनाज के अतिरिक्त इसका लाभ प्रजा को न मिल पाता। इसके आठ साल बाद 1913 में एक पहल भागीरथ व्यास नाम के एक श्रीमाली ब्राह्मण ने की थी। यह धान की दलाली का कार्य धानमंडी में करता था। उसकी राजमहल में सज्जनसिंह राजा की रसोई तक पहुंच थी। राजा भी उस पर मेहरबान थे।


हुक्म सर आंखों पे
इतिहासकार नवीन व्यास ने एक लेख में उल्लेख किया था कि एक दिन भागीरथ ने राजा से कहा होकम, धानमंडी की चक्की तो हुज़ूर की खिदमत में है, ने पण आपणा आखा गाम में एक भी चक्की नी है! यह बात सुन कर राजा सज्जनसिंह हस पड़े, बोले वाह रे भागीरथ! आखा गाम की फिकर थाने लगी सो तूइज एक चक्की क्यू नी डाल दे। भगीरथ चालाक था, बोला,वा जदी दरबार का हुक्म सर आंखों पे, हूं चक्की डाल दूंगा, पण रुपए की तजवीज करनी पड़ेगा। राजा राज़ी खुशी बोले,चक्की डालवा की तजवीज म्हाने ही करनी पड़ेगा।


ऐसे हुआ नाम चक्की वाली गली
कहते हैं कि जल्द ही राजा ने सरकारी खजाने से भगीरथ को 2000 रुपए दिलवाए और आज से 113वर्ष पूर्व सन 1913 में ही भगीरथ ने अपने भतीजे के नाम से श्रीमाली वास में पैलेस वाली गली में लोकनाथ फॉलोअर मिल के नाम से एक चक्की डाल दी जो बरसों तक नगर का अनाज पिसती थी। उस चक्की का आटा खा कर कितनी ही पीढ़ी बच्चे से बूढ़ी हो गई। आज नगर में तो वो चक्की नहीं है, लेकिन चक्की वाली गली के नाम से वह गली अब भी प्रसिद्ध है। नगर की अनेक गलियों ,मोहल्लों के नाम रियासत काल से ही प्रचलन में हैं। सबका इतिहास बहुत रोचक है।