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थमें यात्री बसों के चक्के, हजारों यात्री परेशान

थमें यात्री बसों के चक्के, हजारों यात्री परेशानजिले में 400 बसों थमने से करीब 18 हजार यात्री परेशान

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थमें यात्री बसों के चक्के, हजारों यात्री परेशान


रतलाम. जिले में सोमवार को बस ऑपरेटरों की बुलाई हड़ताल ने भीषण गर्मी मंे हजारों यात्रियों की मुश्किलें बढ़ा दी है। करीब 40 प्रतिशत किराए में वृद्धि के साथ टैक्स से राहत बस ऑपरेटरों की प्रमुख मांग है। पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के बीच हुई हड़ताल में चुनाव साल में किराया बढ़ाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर बन गया है। कई बार की चेतावनी और आश्वासनों के बाद भी बात नहीं बनी तो सोमवार को बस संचालक हड़ताल पर चले गए। सोमवार को रतलाम के साथ जिले के जावरा, आलोट, ताल, सैलाना, सुखेड़ा, ढोढर, बाजना सहित अन्य जगहांे पर हड़ताल का व्यापक असर देखा गया। हजारों यात्री गंतव्य तक पहुंचने के लिए परेशान होते रहे।

टे्नों में दिखा हड़ताल का असर
बस ऑपरेटरों की हड़ताल का हर कही प्रत्यक्ष असर देखा गया। बसों की हड़ताल के कारण यात्री गाडि़यों में भीड़ भी कई गुना बढ़ गई। इसके चलते ट्रेनों में सफर करना भी मुश्किल हो रहा था। इतना ही नहीं बसों की लाईन पर यात्रियों को सफर करवाने के लिए कई गुना अधिक राशि वसूल कर मिनीडोर, ऑटो, जीप, मैजिक से लेकर अन्य वाहन आवाजाही करते दिनभर देखें गए।


बस अड्डों पर पड़ी बसें, भटक रहे यात्री
सोमवार को बस संचालको की हडताल के दौरान जिले के साथ संभाग व प्रदेशभर में चलने वाली यात्री बसें बस अड्डों पर आराम फरमा रही है। बस स्टैंड पर बसें खड़ी है वहीं सफर करने वाले यात्री इस भीषण गर्मी में परेशान हो रहे है। जिले मंे करीब 400 बसें संचालित होती है जो बंद होने से करीब 18 हजार यात्री जो हर दिन इन बसों मंे सफर करते है वह परेशान हो रहे है। इसी तरह प्रदेशभर में करीब 30 हजार बसें प्रतिदिन सैकड़ों यात्रियों को सफर करवाती है जो सोमवार को नहीं चली।


शासन की दोहरी नीति से भी पनप रहा आक्रोश
बस संचालको में शासन की दोहरी नीति को लेकर भी तीखा आक्रोश है। जब-जब भी हादसा होता है या अन्य कोई घटना घटित है तो यात्री सुरक्षा के नाम पर अनेको नियम उन पर थोप दिए जाते है, जबकि सड़कों पर चलने के दौरान होने वाले दिक्कतें कभी कोई नहीं सुनता। इससे भी बड़ी विडबंना यह है कि जो चार्टड बसों का प्रचलन बढ़ा है। इसमें दोहरी नीति अपनाई जा रही है। चार्टड बसों के साथ लाईन पर चलने वाली यात्री बसों का टैक्स बराबर ही है। दोनों तरह की बसों का टैक्स समान है, लेकिन चार्टड बसों मंे यात्रियांे से सीधा तीन गुना किराया वसूला जाता है। जब वह किराया अधिक दे रहे है तो उनसे टैक्स भी अधिक होना चाहिए और यदि एेसा नहीं तो उनमंे भी किराया कम करो या हमसे टैक्स की वसूली भी कम हो।


व्यथा बस संचालको की जुबानी
बस संचालको का कहना है कि पिछले लंबे समय से उनकी मांगों को लेकर सरकार स्तर पर मांग चली आ रही है। जब-जब भी हड़ताल की नोबत आई तो सरकार से प्रतिनिधिमंडल को मिले आश्वासन के बाद हमनें सरकार की बात रखते हुए हड़ताल टाली, लेकिन अब अती हो गई है। वर्ष 2012-13 मंे जब डीजल के दाम 50 रुपए के अंदर थे तब का किराया अब भी चला आ रहा है। इन ६ सालांे मंे कितनी महंगाई बढ़ी है। जीएसटी आई है। पाटर््स महंगे हुए है। मेंटनेस महंगा हुआ है। जीपीएस से लेकर स्पीड गवर्नर और कैमरें भी आ चुके है। टैक्स भी हर साल बढ़ता चला जा रहा है। चालक-परिचालक से लेकर सहायक परिचालक की मजदूरी भी बढ़ी है। बीमा पहले 25 हजार में होता था, आज 75 हजार रुपए में साल का बीमा होता है। डीजल के बढ़ते दामों के बीच कई नई चीजें बस संचालको पर यात्री सुरक्षा के नाम पर लाद दी गई है, बावजूद किराए में बढ़ोतरी नहीं की जा रही है और न हीं टैक्स में राहत दी जा रही है। डीजल पर कर कम कर इसके दाम भी कम करने की अहम मांग है। इन्हीं मांगों को लेकर बस संचालक हड़ताल पर है।
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