
जहां छुत-अछूत का भाव होता है वहां परमात्मा नहीं रहते
रतलाम। जीवन में भगवान के खूब भजन करना चाहिए। हमारी सांसे बड़ी अनमोल है यह बारबार नहीं मिलती है। भक्त शिरोमणी नरसी मेहता सरल जब अपना प्रिय राग केदार गाते तो भगवान भी प्रसन्न हो कर अपनी बांसुरी बजा कर उन के साथ सुर मिलाया करते थे। ऊंच नीच का भाव नरसी मेहता के मन में कभी नहीं रहा वे मानते थे कि जहां छुत अछुत का भाव होता है वहां परमात्मा नहीं रहते है।
यह विचार कथा वाचक पं. अनिरूद्घ मुरारी ने बुद्घेश्वर रोड़ स्थित प्रकाशनन्द आश्रम, नागा महाराज की कुटिया परिसर में चल रही सिखवाल ब्राह्मण समाज ट्रस्ट राधा कृष्ण मंदिर टाटा नगर के तत्वावधान में नानीबाई का मायरा कथा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति मन, वाणी और ब्रह्मचर्य से दृढ़ है, समदृष्टी, तृष्णा त्यागी और परस्त्री को माता समान समझता हैं, दूसरो के धन की लालसा और झूठ नहीं बोलता हैं मन में दृढ़ वैराग रखते हुए भक्ति के मार्ग पर चलता है, उस व्यक्ति केतन में सारे तीथों का वास होता है।
नरसी मेहता द्वारा भजन वैष्णवजन तो तेने कहिए जे पीड़ पराई जाने रे...पर दुखे उपकार करे तोये... मन अभिमान न आनी रे... को महात्मा गांधीजी भी अपनी प्रार्थना सभा में गाया करते थे। ऊंच नीच का भाव नरसी मेहता के मन में कभी नहीं रहा वे मानते थे कि जहां छुत अछुत का भाव होता है वहां परमात्मा नहीं रहते है। भजन तेरे हवाले मेरी गाड़ी तु जाने तेरा काम जाने पर श्रद्घालुजनों ने भाव विभोर हो कर नृत्य किया। कथा का शुभारंभ भगवान श्री कृष्ण प्रतिमा की महाआरती कर मुख्य अतिथि निगमाध्यक्ष अशोक पोरवाल, मुख्य यजमान शांता देवी नाथूलाल बोहरा, संयोजक श्याम उपाध्याय, हलवाई संघ अध्यक्ष विष्णु व्यास, कृष्णा सोनी, देवीलाल उपाध्याय, शंभूलाल पुरोहित, आनंदीलाल बोहरा, गौर्वधन व्यास, भरत उपाध्याय, विशाल उपाध्याय सहित बड़ी संख्या में उपस्थित महिला व पुरूषों द्वारा किया गया।
Published on:
02 Apr 2019 06:02 pm
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