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पेज चार की बाटम- जब अंग्रेजों की मुंडियां काट कर गेट पर टांग दी, मुंडी गेट नाम पड़ गया

रतलाम

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Newsdesk

Aug 14, 2026

datia news

datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)

फोटो-आरटी-1401-डॉ प्रदीपसिंह राव
गेस्ट राइटर साहित्यकार है।


रतलाम। आजादी के इतिहास में 1857 की प्रथम क्रांति में रतलाम का जिक्र कम आता है, क्योंकि राजतंत्र की नींव अंग्रेजों के समर्थन पर ही टिकी हुई थी, लेकिन मंदसौर, नीमच और आसपास बड़ा उत्साह था।इतिहासकार कैलाश पांडे ने लिखा है कि 1857 में शहज़ादा फिरोज ने मंदसौर किले पर कब्जा किया। इसके तुरंत बाद उसने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई छेड़ दी। नीमच के पास जीरन में हुए युद्ध में जावरा के अनवर जमादार और मुंशी गुलामुद्दीन ने कैप्टन रीड और कैप्टन टकर की मुंडियां काट कर मंदसौर ले गए और किले के पश्चिम दरवाजे पर टांग दी थी। अंग्रेज भाग खड़े हुए,दहशत फैल गई। उस दरवाजे का नाम तब से मुंडी गेट पड़ गया। अब भी वह मंडी गेट है।


फिरोज को हराने के लिए ब्रिटिश अधिकारी ड्यूरेंट के नेतृत्व में 7 सेनापतियों की भारी सेना 21 नवंबर 1857 को मंदसौर पहुंची। युद्ध नीमच के मैदान में तीन दिनों 22 से 25 नवंबर 1857 तक हुआ। एक अंग्रेज लेफ्टिनेंट रेडमे मारा गया, लेकिन अंग्रेज जीत गए। चारों क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया जिन्होंने मुंडी काटी थी। उनमें से तीन को उसी गेट पर फांसी दे दी गई। इस दौरान रतलाम जिले के जावरा का अनवर भी शहीद हो गया। क्रांतिकारियों के कारण 163 दिनों तक मंदसौर किले पर आजादी का तिरंगा फिरोज की शहादत तक लहराता रहा। कितने लोग और कौन कौन शहीद हो गए,यह गुमनाम रह गया।



रेलवे स्टेशन पर गूंजा वापस जाओ

रतलाम क्रांति की लहर से अछूता न रहा। 1916 के ऐतिहासिक होमरूल आंदोलन में लोकमान्य तिलक ने नारा दिया था स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं उसे ले कर रहूंगा। इसी नारे को लेकर संत ज्ञानचन्द रतलाम आए और नागरिकों के बीच कांग्रेस कमेटी और खिलाफत कमेटी का गठन हुआ। दोनों संस्थाओं के अध्यक्ष ज्ञानचंद के शिष्य मोहम्मद उमर के नेतृत्व में खादी आंदोलन 1922-23 में रतलाम में चल पड़ा। खादी उत्पादन के लिए एक संस्था सुदर्शन चक्र रतलाम की स्थापना हुई। अपना रतलाम के लेखक नवीन व्यास के अनुसार विदेशी वस्त्रों का नगर में बहिष्कार होने लगा। संत ज्ञानचंद की प्रेरणा से रतलाम के युवाओं ने करो या मरो का नारा बुलंद किया। 17 नवंबर 1921 को जब प्रिंस ऑफ वेल्स ब्रिटिश राज कुमार एडवर्ड भारत आए, तो उनके विरुद्ध पूरे भारत में विरोध हुआ और नारे लगे थे प्रिंस ऑफ वेल्स वापस जाओ। जब वो मुंबई से दिल्ली ट्रेन से जा रहे थे तब रतलाम रेलवे स्टेशन पर सैकड़ों क्रांतिकारियों ने नारे लगाए थे। प्रिंस वापस जाओ-वापस जाओ।


रतलाम आने पर प्रतिबंध
इन युवाओं के दमन के लिए कोई कसर न छोड़ी गई। मोहम्मद उमर, सैयद अहमद और मास्टर लालचंद को हंटरों से पीटा गया। उन्हें जेल में ठूंस कर तीन साल की कड़ी सजा सुनाई गई। बाद में रतलाम रियासत से दूर वीरान जगह ले जाकर कैद कर दिया गया। रतलाम आने पर प्रतिबंध लगा दिया गया । रतलाम में तब राजा सज्जनसिंह का राज्य था। 1923 के बाद क्रांतिकारियों पर दमन शुरू हुआ और खादी उत्पादन पर रतलाम में प्रतिबंध लगा दिया। खादी केंद्र तहस नहस कर दिया। इसके संचालक आनंदीलाल झालानी को रतलाम से निष्कासित कर दिया। इनके साथ भागीरथ और कृष्णमल को कड़ी सजा दी गई।


व्यापारी भी आंदोलन में शामिल

संत ज्ञानचन्द के भाषणों से प्रभावित हो कर व्यापारी भी आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। समीप के गांव धामनोद के सेठ नंदलाल के साथ साथ अनेक किसान संग्राम में भागीदार हो गए। रतलाम में गुमनाम पर्चे छपते और वितरित हो जाते। पुलिस ने मुद्रण करने वालों को धर दबोचा सेठ मथुरालाल, जसु पन्ना और सौभाग्यमल पोरवाल को जेल में ठूस दिया। अमानुषिक यातनाएं दी गई। उनके हाथ पैर काठ के तख्तों में फंसा कर बांध दिए। इस तरह रतलाम में स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी ज्वाला बनने लगी।