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तीन साल में एक बार रखा जाता है इस एकादशी का व्रत, नोट कर लीजिए डेट और शुभ मुहूर्त

जुलाई महीने में एक ऐसी एकादशी का व्रत रखा जाएगा, जो तीन साल में सिर्फ एक बार ही पड़ती है और इसका महात्म्य ये है कि इस व्रत के रखने मात्र से भगवान की ऐसी कृपा प्राप्त होती है कि व्यक्ति को इस संसार में सुख समृद्धि तो मिलती ही है, मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। आइये जानते हैं तीन साल में एक बार पड़ने वाली एकादशी की डेट और शुभ मुहूर्त...

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Pravin Pandey

Jul 21, 2023

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सावन में अधिकमास का महत्व

19 साल बाद सावन में पड़ रही है यह विशिष्ट एकादशी
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, पद्मिनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। इसका उपवास करने के लिए चंद्र मास तय नहीं है। इस एकादशी के तीन साल में एक बार अधिकमास में यह पड़ती है। 19 साल बाद सावन में अधिकमास पड़ने से यह एकादशी सावन में 19 साल बाद ही पड़ रही है।

कब है पद्मिनी एकादशी
दृक पंचांग के अनुसार पद्मिनी एकादशी 29 जुलाई को है। इस तिथि की शुरुआत 28 जुलाई को शाम 06:21 बजे हो रही है जबकि तिथि का समापन 29 जुलाई 2023 को शाम 04:35 बजे हो रहा है। उदयातिथि में यह एकादशी व्रत 29 जुलाई को ही रखा जाएगा। इस दिन पूजा का सबसे अच्छा समय सुबह 7.22 बजे से सुबह 9.04 बजे के बीच है। जबकि इसका पारण 30 जुलाई को सुबह 05:13 बजे से 08:00 बजे तक है। वहीं इस दिन द्वदशी दोपहर 02:04 बजे संपन्न हो जाएगी।

पद्मिनी एकादशी का महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह व्रत सभी पाप कर्मों से छुटकारा दिलाकर पुण्यफल अर्जित कराने वाला है। अधिकमास शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को पूजा और भगवान विष्णु का व्रत दूसरे महीनों के एकादशी व्रत से 10 गुना अधिक पुण्यफल दिलाने वाला होता है।


ज्योतिषचार्यों के अनुसार अधिकमास की एकादशी को व्रत करने वाला मनुष्य इस संसार के समस्त भौतिक सुख का आनंद प्राप्त करता है और मृत्यु के बाद भगवान विष्णु के धाम को भी प्राप्त करता है। धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है कि इस व्रत से बढ़कर कोई यज्ञ, तप या दान नहीं है। पुरुषोत्तम मास की इस एकादशी पर उपवास और भगवान विष्णु की पूजा करने के साथ ही नियम और संयम से रहना चाहिए। ऐसा करने पर भगवान विष्णु के साथ शिव भी प्रसन्न होते हैं।

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पद्मिनी एकादशी पूजा विधि
1. पद्मिनी एकादशी की पूजा की तैयारी दशमी से ही शुरू कर देनी चाहिए। इसके दोपहर बाद से ही नियम संयम और ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक भोजन की अपेक्षा रहती है।
2. इसके बाद एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर तीर्थ स्नान करें और ऐसा संभव न हो तो पानी में गंगाजल डालकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
3. नहाने के पानी में तिल, कुश और आंवले का थोड़ा सा चूर्ण डालें तो बेहतर होगा।


4. नहाने के बाद भगवान सूर्य को अर्घ्य दें और पीत वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु की पूजा करें। सावन चलने से इन्हीं के साथ भगवान शिव का भी ध्यान करें।
5. फिर एक चौकी पर पीत वस्त्र बिछाएं, गंगाजल से पूजा स्थान शुद्ध करें, भगवान विष्णु की प्रतिमा रखें और केसर मिश्रित जल से श्रीहरि विष्णु का अभिषेक करें।
6. भगवान को पीले फूल, माला, अगरबत्ती, धूप अर्पित करें और घी का दीया जलाएं।
7. भगवान विष्णु को फल, मिठाई आदि का यथाशक्ति भोग लगाएं।


8. इसके बाद भगवान के भजन और मंत्रों का पाठ करें। विष्णुजी और एकादशी की कथा सुनें।
9. विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें, आरती उतारें और ब्राह्मणों को दान दें।
10. सारी रात जागकर भगवान का नाम लें और सुबह उठकर स्नान ध्यान के बाद पारण करें।