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आदित्य हृदय स्तोत्र: रोजाना सुबह इस स्तोत्र का पाठ करने से हर संकट दूर होने की है मान्यता

Aditya Hriday Stotra Path Vidhi: कहते हैं जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित रूप से रोज सुबह पाठ करता है उसके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

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आदित्य हृदय स्तोत्र: रोजाना सुबह इस स्तोत्र का पाठ करने से हर संकट दूर होने की है मान्यता

ग्रहों के राजा सूर्य ग्रह को सनातन धर्म में सूर्य देव के रूप में पूजा जाता है। कुंडली में सूर्य की मजबूत स्थिति व्यक्ति को समाज में प्रसिद्धि और करियर में सफलता दिलाती है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को पिता, पुत्र, यश, तेज, आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति का कारक माना जाता है। सूर्य को मजबूत करने के लिए लोग कई तरह के उपाय करते हैं। इन उपायों में आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करना सबसे सर्वोत्तम माना जाता है। कहते हैं जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नियमित रूप से रोज सुबह पाठ करता है उसके जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ की विधि- इसके लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाएं और स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। फिर एक तांबे के लोटे में जल लें उसमें रोली या चंदन और कुछ फूल डालकर सूर्य देव को अर्पित करें। सूर्य को जल देते समय गायत्री मंत्र का जाप करें और सूर्यदेव के समक्ष ही आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। यदि इस पाठ का पूर्ण फल प्राप्त करना चाहते हैं तो इसे नियमित रूप से रोजाना सुबह सूर्योदय के समय करें।

आदित्य हृदयस्तोत्रम्
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् l
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ll
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्l l
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः ll
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् l
येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि ll
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् l
जयावहं जपेन्नित्यं अक्ष्य्यं परमं शिवम् ll
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् l
चिंताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ll
रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् l
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ll
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः l
एष देवासुरगणाँल्लोकां पाति गभस्तिभिः ll
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः l
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमोह्यपां पतिः ll
पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः l
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ll
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् l
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ll
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् l
तिमिरोन्मथनः शंभुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ll
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः l
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ll
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुस्सामपारगः l
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ll
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः l
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः ll
नक्ष्त्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः l
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ll
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः l
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ll
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः l
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ll
नमः उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः l
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ll
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे l
भास्वते सर्वभक्षय रौद्राय वपुषे नमः ll
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने l
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ll
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे l
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ll
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः l
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ll
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः l
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ll
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च l
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ll
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च l
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ll
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् l
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ll
अस्मिन्क्शणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि l
एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ll
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा l
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ll
आदित्यं प्रेक्श्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवां l
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ll
रावणं प्रेक्श्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् l
सर्व यत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ll
अथ रविरवदन्निरीक्श्य रामं l
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ll
निशिचरपतिसंक्शयं विदित्वा l
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ll
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