
Muni Pujya Sagar Maharaj
- मुनि पूज्य सागर महाराज
जाप मन, वचन और काय से किया जाता है। जाप करते समय मन नहीं लगे तो वचन और काय से जाप किया जाना चाहिए। ऐसे जाप मन की भावनाओं को परिवर्तित करने में सक्षम होते हैं। मन के अंदर सकारात्मक सोच का संचार होता है, जीवन जीने की एक सही राह दिखाई देती है, सही-गलत की समझ पैदा होती है। मन, वचन और काय सहज और सरल हो जाता है। कषाय और पाप की क्रिया को विराम मिल जाता है।
व्यक्ति अपने लिए और अपने कर्मों की निर्जरा के लिए सोचता है। उसे हर इंसान के अंदर एक अच्छाई दिखाई देने लगती है और उसी के कारण वह हर इंसान को अपना मित्र समझने लगता है। जाप से शरीर और आत्मा का ज्ञान होता है। शरीर का उपयोग कैसे करें, जिससे आत्मा प्रकट हो जाए और व्यक्ति परमात्मा बन जाए? यह सब जाप से ही संभव है। जाप वॉटर फिल्टर यानी पानी साफ करने की मशीन के समान है, जैसे मशीन के जरिए पानी स्वच्छ होकर पीने योग्य बन जाता है, ठीक उसी तरह जाप मन, वचन और काय को स्वच्छ करने के मशीन है।
इससे हमारे मन, वचन और काय इतने पवित्र और स्वच्छ हो जाते हैं कि हम धर्म को धारण कर उसका मर्म समझ सकते हैं। धर्म का सही स्वरूप समझ और जान सकते हैं। जाप के माध्यम से हम अपने वास्तविक स्वरूप को देख सकते हैं। जाप मील के एक पत्थर की तरह है, जिससे हमें यह पता चलने लगता है कि हम अपनी आत्मा और धर्म से कितने दूर हैं। मन का साथ होने से वह जाप लाख गुना फल देता है।
जाप वीडियो गेम के समान है, जब बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता है तो बच्चा मोबाइल में गेम खेलने लगता है। जब भी उसे समय मिलता है, वह उसे पूरा करने में लगा रहता है और फिर वह दिन आ ही जाता है, जब वह विजेता बन जाता है। जाप भी कुछ इसी सिद्धांत पर आधारित है। जब-जब मन में खराब विचार आए तो जाप माला हाथ में लेकर बैठ जाना चाहिए।
जरूरी नहीं कि जाप करने से एक ही दिन में ही फल मिल जाए, लेकिन ऐसा होने से जाप का संस्कार तो पड़ ही जाएगा। वही संस्कार व्यक्ति के जीवन को महापुरुषों के समकक्ष लाता है। भगवान आदिनाथ को प्रथम आहार देने का सौभाग्य राजा श्रेयांश को मिला। उसका कारण भी राजा श्रेयांश के पूर्व जन्म के संस्कार ही थे, जिससे उन्हें आहार देने की विधि स्मरण आ गई और उन्होंने आहार दान दिया और दान तीर्थ का प्रवर्तन किया।
जाप के संस्कार डालने से जीवन में पाप के समावेश होने की आशंका कम होने लगती है। पाप के आने के 108 द्वार बताए गए हैं। मन, वचन, काय, समरम्भ, समारम्भ, आरम्भ। कर्त, कारित, अनुमोदन। क्रोध, मान, माया, लोभ। 3×3×3×4=108, इन्हीं भावनाओं को ध्यान में रखते हुए जाप करने से पाप के द्वारा आने वाला पाप नहीं लगता है।
Published on:
02 Nov 2017 03:56 pm
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