
badarinath mandir
बद्रीनाथ मंदिरः 27 अप्रैल गुरुवार 2023 को ग्रीष्मकालीन पूजा के लिए बद्रीनाथ धाम के कपाट खोल दिए गए। शुभ मुहूर्त पर सुबह 7.10 बजे भगवान बद्रीनाथ मंदिर के द्वार मंत्रोच्चारण के बीच श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। इस घटना का साक्षी बनने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। 15 कुंतल फूलों से सजे मंदिर का नजारा अद्भुत था। पूरा इलाका बद्रीनाथ के जयकारों से गूंजता रहा, भाव विह्वल भक्तों को देखकर दूसरों के हृदय की भक्ति धारा भी हिलोरें मारने लग रही थी। बाद में भगवान बद्रीनाथ की विशेष पूजा की गई।
कपाट खोलने की प्रकिया सुबह चार बजे से ही शुरू कर दी गई थी। हल्की बारिश और बर्फबारी भी श्रद्धालुओं के हौसलों के आगे पस्त नजर आ रही थी, सेना के बैंड ने मधुर ध्वनि में सबका स्वागत किया। इस दौरान महिला श्रद्धालुओं ने पारंपरिक नृत्य भी किया। हर कोई बद्रीनाथ की एक झलक के लिए आतुर नजर आ रहा था। बाद में श्रद्धालुओं ने अखंड ज्योति और बद्रीनाथ के दर्शन कर पुण्य अर्जित किया।
यहां करिये चार धाम यात्रा का रजिस्ट्रेशनः उत्तराखंड में चार धाम यात्रा शुरू हो चुकी है। यहां जाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है। इसलिए यात्रा से पहले सारी औपचारिकता पूरी करना सुविधा जनक होगा। इसके लिए https://registrationandtouristcare.uk.gov.in/ पर या https://badrinath-kedarnath.gov.in/DefaultHindi.aspx पोर्टल पर जाकर रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं।
इसी के साथ आज आपको चार धामों में से भगवान विष्णु के बद्रीनाथ मंदिर से जुड़े कुछ रहस्य बताते हैं, जिन्हें सभी को जानना चाहिए। यह मंदिर अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नर और नारायण पर्वत की दो श्रेणियों के बीच स्थित है। आइये जानते हैं इससे जुड़े कुछ रहस्य...
1. चार धाम कौन हैं: हिंदू धर्म के चार धाम बद्रीनाथ, द्वारिका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम बताए जाते हैं। लेकिन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जब व्यक्ति बद्रीनाथ दर्शन के लिए जाता है तो उसे गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ के भी दर्शन करना चाहिए। इन चारों को मिलाकर इसे छोटा चार धाम माना जाता है।
2. आठवां बैकुंठः मान्यता है कि केदारनाथ भगवान शंकर के आराम करने का स्थान है तो बद्रीनाथ भगवान विष्णु के आराम करने का स्थान है। यहां भगवान विष्णु छह महीने जागृत अवस्था में रहते हैं और छह महीने आराम की मुद्रा में। यह भी कहा जाता है कि यह सृष्टि का आठवां बैकुंठ है। यहां बद्रीनाथ की मूर्ति शालिग्राम शिला से बनी हुई है और चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। यहां नर नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है, जो अचल ज्ञान ज्योति का प्रतीक है।
3. बद्रीनाथ नाम पड़ने के पीछे की कथा के अनुसार एक बार यहां भगवान विष्णु ध्यान में थे, तभी हिमपात होने लगा। उनका घर हिम से ढंक गया, इस पर माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु के समीप खड़े होकर एक बदरी वृक्ष (बेर) का रूप ले लिया और बर्फ से रक्षा करते हुए तपस्या करने लगीं। जब भगवान ने तप पूर्ण किया तो देखा कि माता भी बर्फ से ढंकी तपस्या कर रहीं हैं। साथ ही कहा कि तुमने मेरे बराबर ही तप किया है, इसलिए इस स्थान पर मुझे तुम्हारे साथ ही पूजा जाएगा। क्योंकि तुमने मेरी बदरी के रूप में रक्षा की है और मुझे बदरीनाथ के रूप में जाना जाएगा। इस इलाके में प्रचुर मात्रा में जंगली बेर की झाड़ी पाई जाती है।
4. भविष्य बद्री के उद्गम की कथाः धार्मिक ग्रंथों के अनुसार एक समय नर नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे और भूकंप, सूखे और जल प्रलय के बाद गंगा लुप्त हो जाएंगी। इसके बाद बद्रीनाथ आने जाने का मार्ग बंद हो जाएगा, धीरे-धीरे बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम भी लुप्त हो जाएंगे। इसके बाद नए तीर्थ के रूप में भविष्य बद्री का उद्गम होगा।
यह भी किंवदंती है कि जोशीमठ के नृसिंह मंदिर में भगवान नृसिंह का एक हाथ साल दर साल पतला होता जा रहा है, जिस दिन यह हाथ लुप्त हो जाएगा। उसी दिन से बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम के लुप्त होने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
5. मंदिर में बदरीनाथ के दाहिनी ओर कुबेर की भी मूर्ति है। उनके सामने उद्धवजी और उत्सव मूर्ति है। उत्सवमूर्ति शीतकाल में बर्फ जमने पर जोशीमठ ले जाई जाती है। उद्धवजी के पास ही चरण पादुका है और बायीं ओर नर नारायण मूर्ति है। इनके पास ही श्रीदेवी और भूदेवी हैं।
Updated on:
27 Apr 2023 09:55 pm
Published on:
27 Apr 2023 09:54 pm
बड़ी खबरें
View Allधर्म और अध्यात्म
धर्म/ज्योतिष
ट्रेंडिंग
