
विचार मंथन : स्वयं से लड़ो, बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना- भगवान महावीर स्वामी
असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं
भगवान महावीर स्वामी जी कहते है- आपकी आत्मा से परे कोई भी शत्रु नहीं है, असली शत्रु आपके भीतर रहते हैं, वो शत्रु हैं क्रोध- घमंड, लालच, आसक्ति और नफरत । सभी मनुष्य अपने स्वयं के दोष की वजह से दुखी होते हैं, और वे खुद अपनी गलती सुधार कर सुखी हो सकते हैं । किसी के अस्तित्व को मत मिटाओ शांतिपूर्वक जियो और दूसरों को भी जीने दो । सुखी जीवन जीने के लिए दो बातें हमेशा याद रखें- अपनी मृत्यु और भगवान । हर एक जीवित प्राणी के प्रति दया रखो, घृणा से विनाश होता है ।
स्वयं से लड़ो, बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना
स्वयं से लड़ो, बाहरी दुश्मन से क्या लड़ना ? वह जो स्वयं पर विजय कर लेगा उसे आनंद की प्राप्ति होगी । आत्मा अकेले आती है और अकेले चली जाती है, न ही कोई उसका साथ देता है और न ही कोई उसका मित्र बनता है । किसी भी जीव को नुकसान न पहुचाएं, गाली ना दें, अत्याचार न करें, उसे दास न बनायें, उसका अपमान ना करें, उसे सताएं अथवा प्रताड़ित न करें तथा उसकी हत्या ना करें । सुख में और दुःख में, आनंद में और कष्ट में, हमें हर जीव के प्रति वैसी ही भावना रखनी चाहिए जैसी हम अपने प्रति रखते हैं । भगवान का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है । कोई भी सही दिशा में अपना श्रेष्ठ प्रयास करके देवत्व को प्राप्त कर सकता है ।
शांति और खुद पर नियंत्रण ही अहिंसा है
क्रोध हमेशा अधिक क्रोध को जन्म देता है और क्षमा और प्रेम हमेशा अधिक क्षमा और प्रेम को जन्म देते है । किसी आत्मा की सबसे बड़ी भूल खुद के असली रूप को नहीं पहचानना है और यह ज्ञान से ही प्राप्त हो सकता है । अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है । शांति और खुद पर नियंत्रण ही अहिंसा है । हर एक आत्मा अपने आप में ही सर्वज्ञ (परिपूर्ण) और आनंदित है. आनंद कभी बाहर से नहीं आता ।
Published on:
08 Apr 2019 06:31 pm
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