
विचार मंथन : प्रेम, प्रसन्नता, आनन्द, ये भी मेहन्दी की भांति ही हैं, जितना दूसरों में बांटोगे उतना स्वयं पर चढ़ेगा- भर्तृहरि
श्रेष्ठ मनुष्यों की मित्रता पत्थर के समान सुदृढ़, मध्यम मनुष्यों की बालू के समान और निकृष्ट मनुष्यों की पानी की लकीर जैसी क्षणिक होती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ जनों का बैर पानी की लकीर जैसा, मध्यमों का बालू जैसा और निकृष्ट जनों का बैर पत्थर जैसा होता है।
मेहन्दी स्त्रियों का श्रृंगार, जिसके हाथ में लग जाता है, उसे अपने रंग में रंग देता है। हमारे यहां ये परम्परा है, विवाहों पर, अन्य कई अवसरों पर, इस मेहन्दी को ऐसे किसी पात्र में रखा जाता है, कि महिलाओं में बांटा जा सके, परन्तु क्या ज्ञात है कि मेहन्दी का रंग सबसे अधिक किन हाथों पर चढ़ता है? इस मेहन्दी का रंग सबसे अधिक उन हाथों पर चढ़ता है, जो सबसे अधिक इसको बांटते हैं।
प्रेम, प्रसन्नता, आनन्द, ये भी मेहन्दी की भांति ही हैं, जितना दूसरों में बांटोगे उतना स्वयं पर चढ़ेगा। तो यदि आप जीवन में प्रसनन्ता पाना चाहते हैं, तो प्रसन्नता को सबमें बांटना सीखिये। जैसे ये हाथ मेहन्दी को सबमें बाँट रहे थे। अपना सुख, अपना वैभव, अपना प्रेम, सबमें बांटते रहिये। आपके जीवन में कभी आपको इसकी कमी नहीं होगी।
मनके की माला आपने कई लोगों के पास देखी होगी, ये माला घुमाते जाते हैं, ईश्वर को स्मरण करते जाते हैं, और निकलते हर मोती के साथ एक पुण्य अर्जित करते हैं। परन्तु क्या यही सबके साथ होता है ? नहीं। आपने ये भी देखा होगा, कई लोग वर्षों तक इस माला को घुमाते जाते हैं, किन्तु फिर भी कुछ नहीं होता।
वही क्रोध, वही अहंकार, वही लालच, वही बाधाएं वैसी की वैसी रहती हैं। किन्तु सारा परिश्रम व्यर्थ गया। कभी सोचा है ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि माला के मनके फेरते-फेरते कई लोग अक्सर एक मनका फिराना भूल ही जाते हैं। मनका मन। इसलिए अगली बार इस माला को फेरने से पूर्व सर्वप्रथम अपने मन को फेरना सीख लीजिये। जितने भी दुष्विचार हैं आपके मन में, निकाल फेंकिये, अंत कर दीजिये इन दुष्विचारों का तभी आयेगी शांति, तभी मिलेगा संतोष, और तभी आयेगा प्रेम।
Published on:
26 Apr 2019 06:19 pm
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