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विचार मंथन : नदी में नहाने, पीपल की पूजा करने और पण्डित को दान करने से व्यक्ति के पाप नहीं धुलते- राजा राममोहन राय

नदी में नहाने, पीपल की पूजा करने और पण्डित को दान करने से व्यक्ति के पाप नहीं धुलते- राजा राममोहन राय

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भोपाल

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Shyam Kishor

Apr 09, 2019

daily thought

विचार मंथन : नदी में नहाने, पीपल की पूजा करने और पण्डित को दान करने से व्यक्ति के पाप नहीं धुलते- राजा राममोहन राय

राममोहन राय की उन सच्चे क्रांतिकारी देश भक्तों में गिनती होती हैं जिन्होंने एक बड़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपना जीवन भारत की सेवा के लिए समर्पित कर दिया । उन्होंने आजीवन अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े लोंगों, बाल विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का भरपूर विरोध किया और दूर करने का प्रयास किया, जिसमें कुछ हद तक सफल भी रहे । राजा राम मोहन राय के क्रांतिकारी विचारों लोग आज भी प्रेरणा और सीख लेते है ।

राममोहन राय के प्रेरणापद विचार
ईश्वर केवल एक है, उसका कोई अंत नहीं सभी जीवित वस्तुओं में परमात्मा का अस्तित्व है । मैं हिन्दू धर्म का नहीं, उसमें व्याप्त कुरीतियों का विरोधी हूँ । हिन्दी में अखिल भारतीय भाषा बनने की क्षमता है । यह व्यापक विशाल विश्वब्रह्म का पवित्र मन्दिर है, शुद्ध शास्त्र है, श्रद्धा ही धर्म का मूल है, प्रेम ही परम साधन है, स्वार्थों का त्याग ही वैराग्य है ।

अंधविश्वास के अँधेरे से बाहर निकलों
प्रत्येक स्त्री को पुरूषों की तरह अधिकार प्राप्त हो, क्योंकि स्त्री ही पुरूष की जननी है, हमें हर हाल में स्त्री का सम्मान करना चाहिए । हमारे समाज के लोग यह समझते हैं कि नदी में नहाने से, पीपल की पूजा करने से और पण्डित को दान करने से हमारे पाप धुल जाएँगे । जो ऐसा समझते हैं, वे भूल कर रहे है, उन्हें नदी में स्नान करने से कभी मुक्ति मिल सकती, वे अंधविश्वास के अँधेरे में भटक रहे हैं ।


यदि मानव जाति किसी के द्वारा थोपे गए विचारों पर ध्यान न दे और अपने तर्क से सत्य का अनुसरण करे, तो उसकी उन्नति को कोई रोक नहीं सकता, प्रत्येक भेदभाव को मिटा कर प्रगति की राह पर अग्रसर हो सकता है । विचलित करने वाले अन्धविश्वासी हैं, धर्माध हैं, वे पूरे समाज में अन्धकार फैलाना चाहते हैं । समाचार- पत्रों को पिछड़ी जातियों तक पहुंचाया जाए, जिससे कि वे ज्ञान के प्रकाश से सराबोर हो सके । किसी भी धर्म का ग्रन्थ पढने से जाति भ्रष्ट होने का प्रश्न ही नहीं उठता । मैंने तो कई बार बाइबिल और कुरानेशरीफ को पढ़ा है, मै न तो ईसाई बना और न ही मुसलमान बना. बहुत से यूरोपियन गीता और रामायण पढ़ते हैं, वे तो हिंदू नहीं हुए ।