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विचार मंथन : दीपक छोटा ही सही पर वह निराशा के वातावरण को आशा और उत्साह से भर देता है- रामकृष्ण परमहंस

Daily Thought Vichar Manthan : दीपक छोटा ही सही पर वह निराशा के वातावरण को आशा और उत्साह से भर देता है- रामकृष्ण परमहंस

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भोपाल

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Shyam Kishor

Oct 24, 2019

विचार मंथन : दीपक छोटा ही सही पर वह निराशा के वातावरण को आशा और उत्साह से भर देता है- रामकृष्ण परमहंस

विचार मंथन : दीपक छोटा ही सही पर वह निराशा के वातावरण को आशा और उत्साह से भर देता है- रामकृष्ण परमहंस

अन्धकार की अपनी शक्ति है, जब उसकी अनुकूलता का रात्रिकाल आता है, तब प्रतीत होता है कि समस्त संसार को उसने अपने आंचल में लपेट लिया। उसका प्रभाव- पुरुषार्थ देखते ही बनता है। आँखें यथा स्थान बनी रहती हैं। वस्तुएं भी अपनी जगह पर रखी रहती है, किन्तु देखने लायक विडम्बना यह है कि हाथ को हाथ नहीं सूझ पड़ता। पैरों के समीप रखी हुई वस्तुएं ठोकर लगने का कुयोग बना देती है। अन्धकार डरावना होता है। उसके कारण एकाकीपन की अनुभूति होती है और रस्सी का सांप, झाड़ी का भूत बनकर खड़ा हो जाता है। नींद को धन्यवाद है कि वह चिरस्मृति के गर्त में धकेल देती है, अन्यथा जगने पर करवटें बदलते वह अवधि पर्वत जैसी भारी पड़े।

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इतनी बड़ी भयंकरता की सत्ता स्वीकार करते हुए भी दीपक की सराहना करनी पड़ती है, जो जब अपनी छोटी सी लौ प्रज्वलित करता है, तो स्थिति में कायाकल्प जैसा परिवर्तन हो जाता है। उसकी धुंधली आभा भी निकटवर्ती परिस्थिति तथा वस्तु व्यवस्था का ज्ञान करा देती है। वस्तु बोध की आधी समस्या हल हो जाती है। दीपक छोटा ही सही अल्प मूल्य का सही, पर वह प्रकाश का अंशधर होने के नाते सुदूर फैलाव को चुनौती देता है और निराशा के वातावरण को आशा और उत्साह से भर देता है। इसी को कहते हैं नेतृत्व।

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सूरज विदा होने को था- अंधकार की तमिस्रा सन्निकट थी। इतने में एक टिमटिमाता दीपक आगे आया और सूरज से बोल उठा-'भगवन्! आप सहर्ष पधारें, मैं निरन्तर जलते रहने का व्रत नहीं तोडूंगा जैसे आपने चलने का व्रत नहीं तोड़ा है। आपके अभाव में थोड़ा ही सही, पर प्रकाश देकर अंधकार को मिटाने का मैं पूरा-पूरा प्रयास करूंगा। छोटे से दीपक का आश्वासन सुनकर सूर्य भगवान ने उसके साहस की सराहना की व सहर्ष विदा हुए।

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प्रयत्न भले ही छोटे हों पर प्रभु के कार्यों में ऐसे ही भावनाशीलों का थोड़ा-थोड़ा अंश मिलकर युगान्तरकारी कार्य कर दिखाता है। आदर्शवादी दुस्साहस की ही प्रशंसा होती है। वह सत्साहस के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है। श्रेय किस व्यक्ति को मिला यह बात नितान्त गौण है। यह तो झण्डा लेकर आगे चलने वाले की फोटो के समान है। जबकि उस सैन्यदल में अनेकों का शौर्य, पुरुषार्थ झण्डाधारी की तुलना में कम नहीं, अधिक होता है।

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