
विचार मंथन : मित्र का प्यार तो सहज प्राप्त है, दुश्मन पर प्यार सहज प्राप्त नहीं होता है- सन्त विनोबा भावे
अपने और पराये
ईसा ने कहा, दुश्मन को प्यार करो। एक भाई ने विनोद में कहा था कि ये गाँधी के चेले दुश्मन को ही प्यार करते हैं, लेकिन मित्र को प्यार नहीं करते! बिल्कुल ठीक है। अगर प्यार करने में पक्षपात करना हो, तो दुश्मन पर ही पक्षपात करूँगा, क्योंकि मित्र पर सहज प्यार है ही। मित्र के लिये खास ध्यान न रहा और परवाह न रही, तो भी उनके लिये तो सहज प्यार होता ही है। इसीलिये दुश्मन पर सविशेष प्यार करूँगा। यह हमारी प्रतिज्ञा है कि जो हमको सकारण दूर मानते हैं, उन पर प्यार करना हमारा फर्ज हैं। निष्पक्ष प्यार के लिये यह आवश्यक शर्त है कि शत्रु के लिये पक्षपात हो ।
मित्रों पर प्यार करो, यह फिजूल आज्ञा है। जैसे पानी को कहा जाय कि नीचे की तरफ बहे, तो यह व्यर्थ आज्ञा होगी। नीचे की तरफ बहना उसका सहल धर्मं हैं, वैसे ही मित्र का प्यार तो सहज प्राप्त है, दुश्मन पर प्यार सहज प्राप्त नहीं होता है, बल्कि दुःख की बात हे कि दुश्मन के लिये सहज प्राप्त द्वेष ही है। इस हालत में उनके बारे में प्रेम का प्रकाश ज्यादा ही होना चाहिये, यह अहिंसा का एक विशेष दर्शन है। इसलिये जो निष्पक्ष अहिंसक हैं, वह दूसरों पर ज्यादा अनुराग रखेगा ।
मेरी माँ का एक किस्सा याद आता है। मेरे पिताजी हमारे घर में हमेशा बाहर के कोई-न-कोई एक लड़के को रख लेते थे और उस लड़के को ठीक घर के जैसे ही रखा जाता था, उसी प्रकार खाना-पीना अध्ययन आदि उसका चलता था। पिताजी को तो उसमें पुण्य-प्राप्ति होती थी, लेकिन सारी सेवा माँ को करनी पड़ती थी। घर में कभी-कभी रोटी बच जाती थी, पहले तो माँ ही दोपहर की उस ठंडी रोटी को खा लेती थी, लेकिन उसके खाने के बाद भी बची, तो वह मुझको देती थी। उस लड़के को तो ताजी रोटी ही मिलती थी। उसको कभी ठंडी रोटी नहीं दी जाती थी। तो मैं कभी-कभी माँ के साथ विनोद कर लेता था, क्योंकि वही एक मेरे विनोद का म्यान थी। मैं उसको विनोद में कहता था कि अभी तेरा भेदभाव मिटा नहीं, मुझको दोपहर की रोटी देती है और उस लड़के को ताजी रोटी खिलाती हो। तिस पर उसने जवाब दिया था, क्या जवाब दिया था? वाह रे वाह! डसने कहा कि “वह मुझे भगवत् स्वरूप दीखता है और तू मुझे पुत्र-स्वरूप दीखता है। तुझमें मेरी आसक्ति पड़ी है तेरे लिये मेरे दिल में पक्षपात है ही, तू भी मुझे जब भगवत् स्वरूप दिखेगा, तब यह भेदभाव नहीं करूँगी ।
रामदास ने भगवान के बारे लिखते हुये कहा है कि वह दयादक्ष, दया करने में प्रवीण है। वह सब के लिये समान हैं, फिर भी वह दुखियों का पक्षपात करता है। वह साक्षी होते हुये भी पक्षपात करता है। यह पक्षपात जो भगवान में रहता हे, वह समत्व होते हुये भी रहता है। हम उसका अनुकरण करना चाहेंगे, तो यही होगा कि जो लोग हमसे भिन्न हैं, उसके लिये ज्यादा अनुराग हमारे दिल में रहेगा।
संत तुकाराम जबरदस्त प्रतिभावान कवि थे। उनके वाक्य चुभ जाते है। उनके वाक्य दिल को नहीं, लेकिन दिमाग को चुभ जाते है। उसने लिखा है कि अपनी देह और अपनी देह से संबंधियों की निन्दा करनी चाहिये और दूसरे जो हैं, उनकी वन्दना करनी चाहिये । श्वान-शूकर की भी वंदना करनी चाहिये ।
Published on:
23 Oct 2018 06:15 pm
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