
मन का चाहा और सब सुख किसे प्राप्त होता है क्योंकि यह सब देव-भाग्य के अधीन है इसलिए संतोष का आश्रय लेना चाहिए। जो संतोष से उत्पन्न अमृत को पीकर भोग-तृष्णा छोड़ते हैं, वे गृहस्थ प्राचीन शास्त्रों (जिनागम) में मुनि तुल्य कहे गए हैं। संतोष अप्ररिग्रह व्रत ग्रहण करने से आता है। जीवन में एक-दूसरे से राग, द्वेष की उत्पत्ति खेत, घर, धान्य, दासी-दास, गाय, भैंस आदि। आसन, शयन, वस्त्र और बर्तन के कारण होती है, व्यक्ति को जीवन में इनकी मर्यादा कर लेना चाहिए जिससे उसके जीवन में संतोष गुण की नींव मजबूत होती है।

संतोष का शाब्दिक अर्थ है तुष्टि, मन का तृप्त हो जाना। हमारे समक्ष जो भी परिस्थितियां विद्यमान हैं उन्हें ईश्वर का अनुग्रह मानें और प्रसन्न रहें। जब साधक के मन में भाव आता है कि उसके पास औरों की तुलना में साधनों की बेहद कमी है, संपदा कम है, पद-प्रतिष्ठा नहीं है तो वह दुखी होता है। अभाव क्यों नजर आता है? जब दूसरों से तुलना करते हैं तभी अभाव नजर आता है। मनुष्य के अलावा कोई और प्राणी अभाव का रोना नहीं रोता क्योंकि उसके पास तुलना करने वाली सोच नहीं है। यदि तुलना की इस आदत पर अंकुश लगाया जा सके तो संतोष की सिद्धि की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम माना जाएगा।