
कबीर की प्रामाणिक साखियां
1. हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मरे, मरम न जाना कोई।
अर्थः संत कबीरदास ने हिंदू-मुस्लिमों के सदियों पुराने झगड़े पर कटाक्ष किया है। उन्होंने एक दोहे में कहा है कि हिन्दुओं को राम प्यारा है और मुसलमानों को रहमान। इसी बात पर दोनों धर्मों के लोग आपस में लड़ते-झगड़ते रहते है। हालांकि यह मर्म नहीं जानते, क्योंकि ईश्वर एक है और सभी मनुष्य उसी की संतान हैं, भले वो ईश्वर को किसी भी नाम से पुकारें।
2. निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटि बँधाइ।
बिन साबण पाँणी बिना निरमल करै सुभाइ।
अर्थः कबीरदास एक दोहे में कहते हैं निंदक को नजदीक रखना चाहिए, संभव हो तो उसके साथ ही रहना चाहिए, क्योंकि निंदिक साबुन और पानी के बिना व्यक्ति की गड़बड़ियों की ओर इशारा कर स्वच्छ होने में मदद करता है। ऐसे निंदक को करीब रखकर उसकी आलोचना पर ध्यान देना चाहिए।
3. अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई।
गूंगे केरी सरकरा, बैठा मुसकाई।
अर्थः कबीरदास के अनुसार प्रेम का वर्णन करना मुश्किल है, इसका आनंद तो वही ले सकता है, जो इस प्रेम में पड़ जाए। उनका कहना है जैसा गूंगे के लिए शक्कर खाने का आनंद है, वह उसे खाते हुए आनंदित होता रहता है और कुछ कह नहीं पाता। वही हाल प्रेमी या कहें ईश्वर की भक्ति में डूबने वाले का होता है।
4. लूटि सकै तो लूटियो, राम नाम है लूटि।
पीछै ही पछिताहुगे, यहु तन जैहै छूटि॥
अर्थः कबीर ग्रंथावली में संत कबीरदास का कहना है कि बिना किसी कीमत के आपकी राम के नाम तक पहुंच है, फिर आप राम के पास पहुंचने की कोशिश नहीं करते। यह शरीर जब नष्ट हो जाएगा, तब पछताना पड़ेगा।
5. अंषड़ियाँ झाई पड़ी, पंथ निहारि निहारि।
जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि पुकारि॥
अर्थः कबीरदास परमात्मा को प्रियतम के रूप में देखते हैं कि मेरी आत्मा परमात्मा के मिलन के लिए तड़प रही है। हाल यह है कि जैसे रास्ता देखते-देखते प्रियतमा की आंखों में झांईं पड़ जाती है और उसको पुकारते पुकारते जीभ में छाले पड़ जाते हैं। उसी तरह मेरी आत्मा परमात्मा से मिलने के लिए तड़प रही है।
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6. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
एकै आषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥
अर्थः कबीरदास इस साखी में बाहरी आडंबर को त्याग कर आंतरिक ईश्वर का ध्यान देने की सलाह देते हैं, कहते हैं कि पोथी पढ़ने के बाद भी कोई पंडित नहीं होता, लेकिन ईश्वर से प्रेम और भक्ति के जरिये व्यक्ति विद्वान बन जाता है।
7. ऊँचे कुल क्या जनमियाँ, जे करणीं ऊँच न होइ।
सोवन कलस सुरे भर्या, साथूँ निंद्या सोइ ॥
अर्थः इस दोहे में भेदभाव पर संत कबीरदास ने कटाक्ष किया है। वे कहते हैं व्यक्ति जन्म से महान नहीं होता है, जबकि उसका कर्म उच्च न हो, जैसे की सोने के कलश में शराब भर देने से भी वह सज्जनों की निंदा का पात्र होता है।
8. कबीर पल की सुधि नहीं, करै काल्हि का साज।
काल अच्यंता झड़पसी, ज्यूँ तीतर को बाज॥
अर्थः संत कबीर दास के इस दोहे में प्रबंधन का गूढ़ मंत्र छिपा हुआ है। ऐसे विद्यार्थी या युवा जो पढ़ाई कर रहे हैं या नौकरी उनके लिए इसमें अपना कार्य समय से करने की बड़ी सीख है। इसमें वो कहते हैं पल की कोई निश्चितता नहीं है और व्यक्ति कल की चिंता में डूबा रहता है। जैसे बाज तीतर को अपना निवाला बना लेता है वैसे ही समय व्यक्ति को अपना निवाला बना लेता है। इसलिए कल की जगह आज के विषय में सोचना चाहिए। क्योंकि जीवन बहुत छोटा और अनिश्चित होता है। अगले ही क्षण क्या होने वाला है किसी को पता नहीं। अगर ऐसा कुछ होता है और पल में सब समाप्त हो गया तो क्या कर लोगे।
9. कबीर मंब पंछी भया, जहां मन तहां उड़ि जाई।
जो जैसी संगति कर, सो तैसा ही फल पाई।।
अर्थः संत कबीरदास के इस दोहे में अच्छी संगति की नसीहत दी गई है। इस दोहे में कबीरदास कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी की तरह बन जाता है, जहां उसका मन जाता है, वहीं शरीर पहुंच जाता है। यह वैसा ही है कि व्यक्ति जैसी संगति करता है, उसी अनुरूप उसका आचरण होता जाता है। अच्छी संगति करने वालों में अच्छे गुण आते हैं और बुरी संगति करने वालों का आचरण खराब होता जाता है।
10. पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।
घर की चाकी कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार।
अर्थः इस साखी में संत कबीरदास हिंदू समाज में व्याप्त आडंबरों की आलोचना करते हैं, उनका कहना था ईश्वर तो हृदय में ही हैं फिर उनके लिए मंदिर-मंदिर भटकने की क्या जरूरत। अगर मंदिर की मूर्ति में भगवान मिलने लगें तो मैं तो पहाड़ की पूजा करने लगूं। इससे तो अच्छा है चक्की की पूजा, कम से कम वह हमारे लिए जो पीसता है वह हमारे भोजन के काम आता है।
Updated on:
02 Jun 2023 08:18 pm
Published on:
20 May 2023 05:38 pm
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