प्रेमानंद जी महाराज ने समझाया कि, खुद को इस भाव से नामजप करने की कसौटी पर कसें। जब इतनी तड़प होने लगे भगवान की, वाहेगुरु को पाने की, जैसे हम प्यासे हो और कोई रबड़ी पिलाएं, तो हम पानी मांगें। इस तरह व्याकुलता हो कि जैसे जल में डुबो देने पर सांस की जरूरत हो। ऐसे ही हमें प्रभु चाहिए। जब इतनी प्यास जाग जाएगी, तब परमात्मा मिल जाएंगे। इस भाव के आगे ही परमात्मा प्रकट होने पर मजबुर हो जाते हैं कि, भक्त को भगवान के अलावा कुछ और चाहिए ही नहीं। फिर तुम्हें कुछ कहने, मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अभी अपनी चाहतों की, मांगने की, इच्छाओं को पूरी करने के लिए उसे याद करने की कमी को ठीक करो। अपनी चाहतों को खत्म करो। जब सब इच्छाएं मिट जाए और परमेश्वर की चाह में व्याकुल हो जाएं, तब उसकी झलक मिलती है। तब भगवान मिलते हैं। तब दर्शन संभव हो पाते हैं।