एक भक्त ने पूछा कि सेवा, परहित चिंतन आदि भी परमात्म तत्व में बाधक कहा जाता है, जबकि ये सात्विक गुण हैं ऐसा क्यों। इस पर संतश्री ने कहा कि जब दान देने में सुख मिलने लगे तो यह अहंकार को जन्म दे देता है, यही बंधनकारक है। यदि आप यह समझ लें कि भगवान की वस्तु आप उनको दे रहे हैं, कोई दान पुण्य नहीं कर रहे हैं इसका चिंतन नहीं करेंगे, वर्णन नहीं करेंगे तो परेशानी नहीं होगी।