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स्पंदन – भावों के धरातल 1

कौन किस पहलू को विशेष महत्व देता है, इसी पर जीवन की धुरी टिकी रहती है। कोई ऊर्ध्वगामी हो जाता है, तो कोई अधोगामी। कार्य समान करने पड़ते हैं, समय समान ही लगता है, किन्तु परिणाम अलग-अलग आते हैं।

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हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। जीवन भी युगल तत्त्व पर आधारित है। युगल के बिना न सृष्टि संभव है और न ही सृष्टि का संचालन। कौन किस पहलू को विशेष महत्व देता है, इसी पर जीवन की धुरी टिकी रहती है। कोई ऊर्ध्वगामी हो जाता है, तो कोई अधोगामी। कार्य समान करने पड़ते हैं, समय समान ही लगता है, किन्तु परिणाम अलग-अलग आते हैं। मात्र श्रम ही परिणाम नहीं लाता, बुद्धि भी परिणामों की दिशा तय कर सकती है। परिणामों का जिम्मा मन का है, भावनाओं का है। मन यदि कार्य में जुड़ेगा ही नहीं तो परिणाम कैसे आएंगे? आधा मन जुड़ेगा तो अधूरे परिणाम ही आएंगे। पूर्ण मनोयोग का यही अर्थ है।

भावनाओं का जुड़ाव
मन के जुडऩे का अर्थ है-भावनाओं का जुड़ाव। कार्य करने की मंशा क्या है और कार्य के परिणाम क्या ढूंढ़ रहे हैं या केवल कर्म समझकर ही कार्य कर रहे हैं? किसके लिए कर रहे हैं? सचमुच कर रहे हैं अथवा दबाव या भय के कारण कर रहे हैं? इत्यादि सभी बातें परिणाम तय करती हैं। ये सभी हमारे मन के भावों की परिचायक हैं।

भावों को हम तीन प्रकार के धरातलों पर आंक सकते हैं—सकारात्मक, नकारात्मक और तटस्थ। सकारात्मक भाव सदा कार्य के गुणों पर केन्द्रित होते हैं, आशावादी होते हैं, लोक-कल्याण के साथ जुड़े होते हैं। व्यक्ति की कल्पना के साथ सकारात्मक भावों का नाता होता है। ये प्रोत्साहन का मार्ग प्रशस्त करते हैं, प्रसन्नता देते हैं।

नकारात्मक भाव कार्य के अवगुणों को पहले देखते हैं। इनमें शंकाओं का प्रभाव अधिक होता है, अस्थिरता अथवा हिचक बनी रहती है। स्मृति का प्रभाव अधिक होता है, व्यक्ति स्वयं केन्द्र में ही सीमित रहता है।

स्थिर रह पाना आसान नहीं है। यह श्रेष्ठ है, किन्तु इसके लिए बहुत अभ्यास की जरूरत पड़ती है। कुछ व्यक्ति स्वभाव से स्थिर होते हैं अथवा दिखाई देते हैं। हर व्यक्ति अलग-अलग जगह पर अलग-अलग लोगों के सामने अलग तरह से व्यवहार करता है। भूमिकाएं बदलता है। अत: बाहर और भीतर वह एक-सा रहे, यह बहुत मुश्किल कार्य है। वह अनायास अलग-अलग दिखाई पड़ सकता है और विचार करके भी।

जीवन में बढ़ता भौतिकवाद भी हमारी अनेक चिन्ताओं का कारण है। हमारे बढ़ते अहंकार का कारण है। यही हमें व्यक्तिवाद की ओर अग्रसर कर रहा है। असुरक्षा का बढ़ता भाव जीवन में अनेक प्रकार के भय पैदा कर रहा है। ये सब मिलकर ही हमारे भावों को नकारात्मक बना रहे हैं। हमारी चिन्ताओं को बढ़ा रहे हैं और हमें मानसिक रूप से रोगी बना रहे हैं।

मन का वातावरण
जीवन की विकास यात्रा सहज नहीं होती। मानव-जीवन हमें प्रसाद रूप में मिला है, यह आसानी से नहीं मिलता है। सृष्टि या सृजन विकास का अन्तिम सोपान है। मानव के पास बुद्धि है। वह विवेक और प्रज्ञा प्राप्त कर सकता है। प्रकाश देवताओं का भोजन है, अंधकार असुरों का। हमने रात्रि-भोज को श्रेष्ठ मानकर असुर समाज में जगह बनाने की सोची। मानव की मर्यादा छोडक़र पशु के समान दिनभर कुछ न कुछ खाते रहने को श्रेष्ठ माना। भौतिकवाद के इस चक्र से हमें बाहर निकलना होगा। अपने जीवन की सार्थकता का विचार तो करना ही होगा। किन्तु, यह सब बिना सकारात्मक भाव के संभव नहीं हो सकता। यह मुश्किल कार्य नहीं है, किन्तु जब तक हम कोई निश्चय नहीं करें, तो यह आएगा नहीं।

इसके लिए वातावरण बनाना पड़ेगा। मन का वातावरण, जहां सदा विकास का चिन्तन हो, जीवन का चिन्तन हो। आपके परिवार का हर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है, चाहे वह आपको अच्छा लगे या न लगे। उसके योगदान से ही आपका व्यक्तित्व विकास पा रहा है। आप जहां कार्य करते हैं, वहां हर व्यक्ति आपके व्यक्तित्व में योगदान करता है। वे सब हैं, इसीलिए संस्थान का व्यक्तित्व है, आपका व्यक्तित्व है। जब वहां कोई नहींं होता तो आपको वह संस्थान अच्छा कैसे लगता? आपको अपने संस्थान पर गर्व है तो इन सबके कारण ही है। सबने मिलकर संस्थान को गर्व करने योग्य बना रखा है। संस्थान का हर कर्मचारी, भवन, पेड़-पौधे आदि सभी महत्त्वपूर्ण हैं। सब मिलकर ही उसका स्वरूप-निर्धारण करते हैं। हर एक का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व है और संस्थान इन सबका सामूहिक व्यक्तित्व है, अत: सभी महत्त्वपूर्ण हैं।

जीवन में हर घटक का महत्त्व है, यह बात समझ में आते ही सकारात्मक भाव की शुरुआत हो जाती है। आपके मन में सबके लिए आदर-भाव पैदा होता है। समाज में हर व्यक्ति का जीवन में योगदान दिखाई पडऩे लग जाता है। यही भाव मन में नया वातावरण बनाता है, जीवन को समझने का मार्ग प्रशस्त करता है। आप अपने आप में कितने ही महत्त्वपूर्ण हों, इस भाव के आते ही आपका महत्त्व कम होता जाता है, अहंकार छंटता जाता है। व्यक्ति भीतर के चिन्तन में उतरने लगता है। जीवन को नजदीक से देखने लगता है। स्वयं को दूसरों के लिए कैसे उपयोगी बनाए, इस पर विचार करता है। व्यष्टि से समष्टि की ओर मुड़ता है। उसका यश बढ़ता है, विनय बढ़ता जाता है, कर्म की भूमिका बदलती जाती है। कार्य और चर्चा वही रहती है, केवल भाव बदलते हैं। इसी से कार्यों के परिणाम बदलते हैं।

भौतिकवाद के केन्द्र में शरीर होता है। सकारात्मक भाव में मन की प्रधानता होती है। मां जिस प्रकार बच्चे का कार्य करते समय शरीर को भूल जाती है और भावों के सुख का आस्वादन करती है, यही पवित्रता मानस में सकारात्मक भाव बनाए रखती है।