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ध्यान का साधारण अर्थ है किसी एक विषय पर केन्द्रित हो जाना। व्यक्ति के लिए सबसे कठिन कार्य भी यही है। किसी से भी बात करके देखिये, वह यही कहेगा कि थोड़े समय के लिए भी ध्यान केन्द्रित रहना मुश्किल काम है। अनेक विषय और विचार आते-जाते रहते हैं, ध्यान बंट जाता है। बिना एकाग्र हुए आप किसी भी कार्य को सही ढंग से, पूर्णता से, उत्कृष्टता से नहीं कर सकते। कार्य की बारीकियां आपकी समझ में नहीं आ सकतीं। आप विषय की गहराई को कभी नहीं छू सकते।
प्रश्न यह है कि मन एकाग्र क्यों नहीं होता? वह क्यों इधर-उधर भटकता रहता है? मन इन्द्रियों का राजा है। वह सदा चंचल, अस्थिर तथा भ्रमणशील रहता है। मन सदा एक अभाव अनुभव करता है। अतृप्ति का भाव उसे शान्त नहीं होने देता। मन चाहता है—शुद्ध ज्ञान और आनन्द, जो उसका मूल स्वभाव है। जब उसकी यह भूख शान्त हो जाती है तो मन की चंचलता भी शान्त हो जाती है। मन आत्मा को चाहता है। आत्मा ही मन का आनन्द है, मित्र है। सत, रज, तम के आवरण के कारण मन आत्मा को देख नहीं पाता और पूरी उम्र उसे कण-कण में खोजता रहता है। बहिर्मुखी होने के कारण ही आत्मा पास होते हुए भी नहीं दिखाई देती। ध्यान मन को अन्तर्मुखी करने का मार्ग है, ताकि वह आत्मा को देख सके, आनन्द प्राप्त कर सके।
ध्यान एक प्रवाह
जो मन को नहीं जानता वह मन की गति, मन की चंचलता और इससे उत्पन्न अशान्ति को कैसे जान सकता है? बिना कारण को समझे वह निवारण भी नहीं कर सकता।
मन कोई स्थाई तत्व नहीं है। यह चेतना का एक स्तर है, प्रवाह है। मन पैदा होता रहता है, विलीन होता रहता है। यह स्मृति, कल्पना और चिन्तन का धरातल है, अत: इसकी चंचलता भी स्वाभाविक है। चंचलता का अर्थ है सक्रिय होना। यह उसके होने का प्रमाण भी है। मन को दमित करने की आवश्यकता नहीं है। इससे तो वह और अधिक चंचल होगा। उसे समझने की और उसके प्रवाह को नया मोड़ देने की जरूरत है। उसको समझने के लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। मन के कार्यकलाप इन्द्रियों पर आधारित होते हैं। बाह्यजगत् के अनुभव इन्द्रियों द्वारा मन तक पहुंचते हैं। इसी कारण मन बाह्यजगत् की गतिविधियों से मुक्त नहीं हो पाता, अपितु जुड़ता चला जाता है। क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का एक सघन जाल बनता चला जाता है। आवश्यकता है इस जाल को बनने से रोकने की, अनावश्यक को रोकने की। इसके लिए कुछ समय निकालकर ध्यान करने की आवश्यकता है।
आप शान्त होकर किसी भी एक आसन में बैठ जाएं। धीरे-धीरे लम्बा श्वास लें और धीरे-धीरे श्वास को छोड़ें। छोडऩे में तो अधिक समय लगना चाहिए। आपको स्वत: ही इसका परिणाम समझ में आने लगेगा। यह तो व्यायाम ही हुआ। इसमें आप प्रयास करके ध्यान को नासाग्र पर टिका लें। नासाग्र के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं दे। शेष इन्द्रियां भी इसी के साथ क्रियाशील होने लगेंगी। नेत्र श्वास को देखेंगे, कान भीतर की ध्वनि को सुनेंगे। नासिका श्वास की हवा का तापमान देखेगी।
जब इन्द्रियों की चपलता शान्त होने लगे तब चित्त को किसी एक विषय पर केन्द्रित करें। इसको धारणा कहा जाता है। अब मन में केवल एक ही विषय चलेगा। धारणा आध्यात्मिक भी हो सकती है, आधिदैविक या आधिभौतिक भी। हमारे यहां शास्त्रों में अनेक प्रकार की मुद्राओं का वर्णन मिलता है जो धारणा को स्थायित्व देने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। धारणा ही अभ्यास के साथ-साथ ध्यान का रूप लेती है।
निर्णय के प्रति एकाग्रता, निरन्तर एकाग्रता ही ध्यान कहलाती है। अन्य विषय ठहरें ही नहीं। आध्यात्मिक धरातल का ध्यान स्वरूप के सहारे आगे बढ़ता है। अपने इष्टदेव का चित्र मन में बनाकर उसी पर ध्यान केन्द्रित करना, उनके शरीर के प्रत्येक अंग का ध्यान करना व्यक्ति को लम्बे समय तक ध्यान में एकाग्रता दे सकता है। इसके बाद आसानी से अमूर्त ध्यान में प्रवेश किया जा सकता है। यह क्षेत्र प्रकाश का क्षेत्र होता है। ध्यान की गहनता ही समाधि है।
अस्तित्व की जिज्ञासा
अन्त:करण की शुद्धता से श्रद्धा पैदा होती है। श्रद्धा से ही साधन में तत्परता होती है। तत्परता से मन और इन्द्रियों का निग्रह होकर आत्मभाव में ध्यान हो पाता है। ध्यान की एकाग्रता का अपने आप में कोई मूल्य नहीं होता। मूल्य होता है ध्यान की विषयवस्तु का। जो एकाग्रता अपने अस्तित्व के प्रति जिज्ञासा पैदा करे, साधना की दृष्टि से वही बहुमूल्य है। इसी से स्वयं को पहचानने की उत्सुकता बढ़ती है। एक बार यह उत्सुकता जाग्रत हो जाए तो समझने का रास्ता मिल जाता है।
आचार्य तुलसी ने लिखा है कि ध्यान की दो सबसे बड़ी बाधाएं हैं—अहंकार और ममकार। व्यक्ति अहंकार और ममकार से विकल्पों का सर्जन करता है। ध्यान के लिए निर्विकल्पता का विकास आवश्यक है। अहंकार व्यक्ति की चेतना को आवृत्त करता है और ममकार उसको पर-सापेक्ष बनाता है। संस्कार के सारे सम्बन्ध अहंकार और ममकार से जुड़े हुए हैं। कषायों का विस्तार भी इन्हीं से होता है।
जिस प्रकार खेती करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से कार्य करना पड़ता है। भूमि को उर्वर बनाने के लिए खाद और पानी दिया जाता है, उसी प्रकार ध्यान का अभ्यास भी क्रमश: किया जाए तो परिणाम शीघ्र व सही मिलते हैं। अभ्यास के साथ चित्त की निर्मलता बढ़े, विकल्पशून्यता बढ़े। मैत्री, ऋजुता, पदार्थ-विरति, आत्मानुभूति और अमूच्र्छा के द्वारा चित्त को भावित करने से अहंकार और ममकार की ग्रंथियां खुलती हैं। कर्म-संस्कार निर्मूल होते हैं। इस प्रकार ध्यान की ठोस पृष्ठभूमि निर्मित हो जाती है।
Published on:
29 Mar 2019 02:50 pm
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