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स्पंदन : विच्छेद-5

शक्ति का ग्रहण-पोषण का गुण (संस्थ्यान धर्म) मन से छिटककर शरीर मात्र में रह जाता है। मां और सन्तान का भी विच्छेद यहीं से शुरू हो जाता है।

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Gulab Kothari

Feb 25, 2018

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दाम्पत्य तो शक्ति और शक्तिमान के जीवन को ही कलात्मक बनाता है, सृजनात्मकता प्रदान करता है। जब शक्ति भी शक्तिमान बनकर खड़ी हो जाए, तब प्रकृति का विकृत स्वरूप प्रकट होने लगता है। शक्ति का ग्रहण-पोषण का गुण (संस्थ्यान धर्म) मन से छिटककर शरीर मात्र में रह जाता है। मां और सन्तान का भी विच्छेद यहीं से शुरू हो जाता है। मां अब सन्तान के लिए गुरु नहीं बन सकती। निर्माण का मार्ग अवरुद्ध होना यहीं से शुरू हो जाता है। पुरुष भाव का सन्तान के साथ भावनात्मक जुड़ाव कम ही हो पाता है। किन्तु जब मां का जुड़ाव घट जाए तो शेष क्या रह जाता है?

मैं और मेरा
शिक्षा व्यक्ति को आत्मा से दूर करके बाहर के स्थूल जगत् से जोड़ती है। मन आत्मा से निकटतम होता है। शिक्षा में वह भी स्थूल हो जाता है। दोनों जीवन के आधारभूत धरातल छूट जाते हैं। व्यक्ति हवा में ही जीने लगता है। शरीर उसका आधार बन जाता है। इसी के आधार पर ‘मैं और मेरा’ रह जाता है। जिसे ‘मेरा’ कहा जाता है, वह सब ‘मैं’ का पर्यायवाची बन जाता है। ‘मैं’ खुद खो जाता है। व्यक्ति को नहीं पता शरीर में कौन जी रहा है। शरीर का सुख सुविधाओं के साथ जुड़ा है। कैरियर के पीछे भागने का कारण भी इन्द्रिय भोग ही है। इन्द्रियमन ही इसका केन्द्र है।

इन्द्रिय मन शरीर से जुड़ा रहता है। सर्वेन्द्रिय मन हृदय से जुड़ता है, महन्मन सुषुप्ति में कार्य करता है और श्वोवसीयस (अव्यय) मन आत्मा कहलाता है। मन एक ओर बाहर से जुड़ता है और दूसरी ओर भीतर से जुड़ता है। शिक्षा ने भीतर के द्वार बन्द करके जीवन को एक पक्षीय बना दिया। शरीर और बुद्धि का सम्बन्ध बाहरी जीवन से तो होता है, किन्तु सुख-दु:ख से नहीं होता। सुख-दु:ख सर्वेन्द्रिय मन के विषय हैं। आज का मनोविज्ञान भी मूलत: इसी पर आधारित है। इसमें जीवन की परिस्थितियों के अनुभव तो हैं, निराकरण नहीं हैं। इसका स्वामी चन्द्रमा है। शरीर के ७० प्रतिशत जल का, स्त्री शरीर के मासिक स्राव का तथा पुरुष शरीर के २८ सहपिण्डों का नियामक भी चन्द्रमा ही है। पूर्णिमा को जल में ज्वार तथा रक्त में भी परिलक्षित होता है। चन्द्रमा की कलाओं के अनुरूप मन में उतार-चढ़ाव होता है। तब क्या हम प्रकृति के नियंत्रण में नहीं हैं?

कर्मफल का नियंत्रण
जीवन पर एक बड़ा नियंत्रण कर्मफल का भी होता है। न चाहते हुए भी कई अनचाही स्थितियां बनती हैं, परिणाम बदलते रहते हैं। घटनाएं घट जाती हैं, दुर्घटनाएं हो जाती हैं और हमें स्वीकार करना पड़ता है। विवाह भी तो इसी क्रम की एक घटना है। फिर हम इसे स्वीकार करने को पूर्णत: तैयार क्यों नहीं हो पाते? आज तो तलाक का नया सिलसिला शुरू हो चुका है। भले ही दूसरी शादी अधिक अपूर्ण हो। सुविधा, स्वतंत्रता ही हमारी आज की प्राथमिकता है। उसी को सुख मान लेना बड़ी भूल है। स्वतंत्रता में तंत्र होता है, सुविधा तंत्र का सम्मान कहां करती है।

स्वतंत्रता कागजों में होती है। व्यक्ति कहीं भी व्यवस्थित नहीं रह पाता। स्वयं को दिनभर की चर्या में इतना बांध लेता है कि कहीं मुक्त दिखाई ही नहीं देता। स्वच्छन्दता सबसे बड़ा बन्धन बनता है। स्वतंत्रता संकल्प है, स्वच्छन्दता विकल्प है। बिना संकल्प के निर्माण की शक्ति, जूझने का साहस, अवरोधों को चुनौती देने की शक्ति प्राप्त नहीं होती। स्वच्छन्दता या तो प्रमाद सिखाती है या फिर पलायनवाद का मार्ग प्रशस्त करती है। जीवन को बिखेर देती है।

जीवन के आयाम
जीवन के तीन धार्मिक आयाम हैं-यज्ञ, तप और दान। धार्मिक का अर्थ है संकल्पवान जीवन का प्रतीक।

विवाह एक यज्ञ है, कन्यादान के द्वारा सम्पन्न होता है। दोनों को मिलकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए उम्रभर तपना है। दोनों का एक हो जाना यज्ञ है। सोम का अग्नि में आहूत होना यज्ञ है। दोनों आत्मा का एकीकरण यज्ञ है। राधा-कृष्ण का न टूटने वाला योग यज्ञ है। दोनों के शरीर, मन, बुद्धि इस यज्ञ के साधन हैं। प्राण कराने वाला है। भावना ही समिधा बनती है। प्राणन ही तप है। स्वेद ही सृष्टि है। सात पीढिय़ों के पितर साक्षी बनते हैं। कितनी प्राकृतिक सम्पदा काम आती है जीने में। सूर्य-चन्द्रमा से लेकर हवा-पानी-अग्नि-पृथ्वी क्या बाहर रह सकता है। जीवन से। और सब कुछ अमूल्य। इसके बदले केवल सम्मान चाहिए इन संसाधनों को। जब व्यक्ति को यह बात समझ में आ जाती है, तब वह इन संसाधनों से खिलवाड़ नहीं कर सकता। भारत इस बात का बड़ा प्रमाण है जहां ये प्रकृति देव-रूप में पूजित हैं। अन्न भी यहां ब्रह्म है, शब्द या नाद भी ब्रह्म है। ‘अग्नि-सोमात्मकं जगत्’ कहा जाता है। प्रकृति के सौहाद्र्र का यह वातावरण ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सूत्रपात करता है। व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं को ऋणी मानकर जीता है। ऐसा व्यक्ति इन संसाधनों का अनावश्यक दोहन कभी नहीं कर सकता।

भारतीय सनातन परम्परा इससे भी एक कदम आगे का चिन्तन रखती है। यहां प्रतिदिन शान्ति के लिए, हर व्यक्ति, शान्ति पाठ करता है। ताकि भूल से भी कोई अपराध हो जाए तो धरती माता क्रुद्ध न हो। उसका जीवन भी इन्हीं पंच महाभूतों पर निर्भर करता है। इसका उदाहरण आज चारों ओर प्राकृतिक आपदाओं का साम्राज्य फैलता दिखाई पड़ रहा है। तूफान, बर्फ, ज्वालामुखी, समुद्री तूफान किसी दिन भी ठहरते दिखाई नहीं पड़ते। यहां तक कि समुद्रों पर बढ़ती गतिविधियों ने पृथ्वी के नवनिर्माण में बाधा पहुंचाना शुरू कर दिया और सभी अनभिज्ञ बने बैठे हैं। क्योंकि विज्ञान को शायद यह तथ्य नहीं मालूम कि, शरीर और पृथ्वी (पिण्ड) का निर्माण जल से, एक ही सिद्धान्त से होता है। अन्तरिक्ष की आर्द्रता भिन्न है तथा सागर का जल भिन्न है।