शनि देव कब देते हैं शुभ-अशुभ फल, जानिये यहां

शनि दंड के विधान के तहत...

ज्योतिष में शनि को न्याय का देवता माना जाता है। वहीं कुंडली में इसे दंड के विधान के चलते दुख का कारक माना जाता है। शनि की कर्म के आधार पर दंड की प्रकृति के चलते हर कोई शनि का नाम सुनते ही डर जाता है। जबकि जानकारों के अनुसार शनि केवल आपके द्वारा किए गए गलत कर्मों के आधार पर ही आपको दंड देते हैं। जहां एक ओर आम जन शनि को अत्यंत बुुरा ग्रह मानते हुए इससे डरते हैं, वहीं ज्योतिष के जानकारों का कहना है कि शनि दंड के विधान के तहत जहां लोगों को अर्श से फर्श तक ला देते हैं। वहीं यदि आपके कर्म अच्छे रहे हैं और शनि आप पर प्रसन्न हैं तो वे फर्श से भी लोगों को अर्श तक पहुंचा देते हैं।

दरअसल शनि के दंड विधान के कुछ खास मानक हैं, जिनके आधार पर ही शनि किसी को शुभ या अशुभ फल प्रदान करते हैं। ऐसे में जब किसी जातक पर साढ़ेसाती आती है तो जातक में यह जानने की ख्वाहिश बढ़ जाती है कि उनके ऊपर साढ़ेसाती कब तक बुरा प्रभाव देगी, और उसके लिए साढ़ेसाती कितनी बुरी या कितनी अच्छी है।

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लेकिन क्या आप जानते हैं कि शनि की साढ़ेसाती प्रारंभ होना या शनि की ढैया का लगना, यह सब तब ही हानिकारक हो सकते हैं जब शनि की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो, जन्मकुंण्डली में खराब भावों का-सूचक हो, अगर यह खराब भाव में नहीं है या दशा अंतर्दशा नहीं चल रही हो, तो शनि अशुभ नहीं होता, मतलब जातक को हानि नहीं पहुंचाता। केवल देखता है कि कौन अनुचित और पाप के कार्य कर रहा है, उनको अपनी दशा-अंतर्दशा में या साढ़ेसाती के दौरान ही उन सबका फल देता है।

जन्मकुंडली की खास बातें जो बताती हैं शनि का प्रभाव:-

1. व्यक्ति की कौन सी दशा-अंतर्दशा चल रही है।

2. जिस ग्रह की दशा-अंतर्दशा चल रही हो, वह कुंडली में कहां पर स्थित है।

3. शनि कौन से भावों का स्वामी है।

4. शनि किस राशि में गोचर कर रहा है।

5. शनि की कौनसी दृष्टि उन भावों पर या स्वामी ग्रह पर पड़ रह है। यही दृष्टि उस दशा या अंतर्दशा के मिलने वाले फल को प्रभावित करती है।

6. चंद्रमा का गोचर क्या है, जन्म कुंडली में चंद्रमा किस भाव का स्वामी है।

7. चंद्रमा कुंडली में शुभ भावों से संबंध रखता है या अशुभ भावों के साथ।

8. जन्मकुंडली में चंद्रमा किस राशि में है, राशि के शुरु में है (शुरु के अंशों में) या मध्य में या किस स्थिति में है।

9. चंद्रमा और शनि के अंशों को भी देखना चाहिए।

10. शनि किस भाव का स्वामी है, किस-किस भाव पर शनि का प्रभाव है जिससे जातक प्रभावित हो सकता है।

11. जन्मकुंडली में शनि किस अंश पर है, कौन सा नक्षत्र है, उस नक्षत्र का स्वामी ग्रह कौन सा है, स्वामी ग्रह किस भाव का स्वामी है। यह सभी देखना भी बहुत जरूरी है।

शनि ग्रह कितना शुभ या अशुभ है। शनि ग्रह जितना कष्ट और हानि देता है, उतना ही लाभ, यश और सम्मान भी देता है, यह सभी जन्मकुंडली में चंद्रमा और शनि की स्थिति और बल पर निर्भर करता है।

कुंडली में ये सब चीजें देखने से ज्ञात हो जाता है कि शनि आपके लिए कितना शुभ और अशुभ है, वर्तमान में शनि से क्या लाभ पहुंच रहा है या आगे शनि कितना नुकसान पहुंचने वाला है, इन सब बातों से ये भी जाना जा सकता है।

इसके अलावा जानकारों के अनुसार शनि ब्रह्म ज्ञान का भी कारक है, यह मजदूर, न्याय का भी स्वामी है। किसी भी जगह को शुष्क और स्वादहीन कर देना शनि का खास गुण है। शनि का बुध से संबंध होने पर यह जातक से बेईमानी अवश्य करवाता है। शनि - मंगल, राहु और सूर्य से युति और अष्टमेश से संबंध होने पर मारकेश का रूप बना लेता है।

भावों के अनुसार शनि का असर...
चतुर्थ भाव में शनि हो तो जातक ज्यादातर पुराने मकान में ही रहेगा, अगर नया मकान खरीदेगा तो उसमें रह ही नहीं पाएगा। वह शुक्र की दशा-अंतर्दशा में किसी दूसरी महिला से धन दिलाता है। कोई नया वाहन नहीं खरीद सकेगा, अगर खरीद लिया तो ज्यादा देर तक रख नहीं सकेगा, ऐसे जातक को माता का सुख न के बराबर होगा।

पंचम का शनि संतान कष्ट, कुटिल, दिवालिया योग देता है।

छठे भाव का शनि हो तो जातक हठी, निरोगी, शत्रुओं से अजय, पशु, ज़मीन जायदाद मिलती है।

सप्तम में शनि होने से जातक झगड़ालू, रोगी, समाज से तिरस्कृत, स्वयं व्यभिचारी, स्त्री भी व्यभिचारिणी हो जाती है।

अष्टम का शनि धन का नाश, रोगी, शनि-मंगल की युति पर गुप्त रोग होने की संभावना बनी रहती है

नवम में शनि उच्च का होने पर जातक संन्यासी, देवतुल्य होता है। बलहीन शनि पिता के लिए अरिष्ट होता है। शुभ शनि की दशा-अंतर्दशा में राजसत्ता से लक्ष्मी प्राप्त होती है।

दशमेश शनि अपने नवांश में या शनि के नवांश में हो तो लक्ष्मी योग होता है। शनि वृषभ लग्न में नवमेश या दशमेश होता है और वह कहीं दशम या एकादश में हो तो पूर्ण लक्ष्मी योग बनता है।

शनि की युति का प्रभाव...
: शनि शुक्र की युति चतुर्थ में होने पर जातक को मित्रों और स्त्रियों से धन प्राप्त होता है। यही युति अगर दशम में हो तो वैभवशाली एवं राजा के समान होता है।

: अगर शनि गुरु की युति हो तो दोनों एक-दूसरे बृहस्पति के प्रभाव को ले लेते हैं मतलब शनि पर बृहस्पति का प्रभाव आ जाता है तो बृहस्पति पर शनि का।

: अगर शनि की दृष्टि चंद्र पर हो या चंद्र की दृष्टि शनि पर हो या दोनों इकट्ठे लग्न में हों तो उच्चकोटि का तपस्वी या महान संत, धर्म प्रचारक होता है।

: मेष लग्न या मेष राशि में हो तो या मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु व मीन का शनि जन्मकुंडली में हो तो जातक को किसी खास विषय पर महारत हासिल होती है।

वहीं साढ़ेसाती के दौरान अगर किसी भी जातक की जन्कुंडली में चंद्रमा पूर्ण बली, उच्च वृषभ राशि में हो या स्वराशि का हो तो शनि के शुभ प्रभावों को चंद्रमा काफी कम कर देता है। चंद्रमा के निर्बल होने या शत्रु की राशि या नीचस्थ राशि वृश्चिक के होने पर शनि की अशुभता में वृद्धि करता है, जिससे जातक को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और जातक मानसिक तनाव में रहता है।

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दीपेश तिवारी
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