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chaitanya mahaprabhu Jayanti: ऐसा भक्त जिसके नाम संकीर्तन का यूरोप तक पड़ा असर, जानिए अनमोल बातें

फाल्गुन पूर्णिमा पर जोश ओ खरोश के साथ चैतन्य महाप्रभु की जयंती (chaitanya mahaprabhu Jayanti )मनाई जाएगी। यह तिथि इस साल सात मार्च को पड़ रही है, चैतन्य ऐसे भक्त कवि, वैष्णव धर्म के प्रचारक थे जिन्होंने देश ही नहीं दुनिया के अंधकार को अपनी भक्ति और नाम संकीर्तन से दूर किया। इन्होंने गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी और भजन गायिकी की नई शैली को जन्म दिया। ऊंच नीच, जाति पाति को खत्म करने में योगदान दिया और विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया। आइये जानते हैं चैतन्य प्रभु की अनमोल बातें(chaitanya mahaprabhu anmol vachan)...

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Pravin Pandey

Mar 05, 2023

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chaitanya mahaprabhu Jayanti

कब है चैतन्य महाप्रभु की जयंतीः चैतन्य महाप्रभु का जन्म फाल्गुन पूर्णिमा यानी होली के दिन (18 फरवरी 1486 को) पूर्व बंग के अपूर्वधाम नवद्वीप में हुआ था। इनके पिता सिलहट के रहने वाले थे, इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र और माता का नाम शची देवी था।


पं. जगन्नाथ मिश्र के घर चैतन्य से पहले आठ कन्याओं ने जन्म लिया, लेकिन सब असमय दुनिया छोड़ गईं। इसके बाद चैतन्य का जन्म हुआ। इनका नाम विश्वरूप रखा गया और माता-पिता इन्हें निमाई बुलाते थे। इनकी कुंडली बनाने वाले ज्योतिषी ने बताया था कि यह बच्चा महापुरूष बनेगा, जो बाद में सच हुआ। इनकी पत्नी का नाम लक्ष्मी देवी और विष्णु प्रिया देवी था। बाद में 24 साल की उम्र में इन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया। इसके बाद इन्होंने दक्षिण भारत का भ्रमण किया।


कहा जाता है इस समय मायावादी प्रचार प्रसार कर रहे थे, विदेशी शासकों के कारण जनता अपना धर्म छोड़ रही थी और चैतन्य ने वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार न किया होता तो भारत में वैष्णव धर्म मानने वाले शायद ही मिलते। इस समय महाप्रभु ने हरिनाम का प्रचार कर वैष्णव धर्म की प्रेम स्वरूपा भक्ति फैला दी।


बंगाल के वैष्णव महाप्रभु को भगवान का अवतार मानते हैं और होली पर जन्मदिन पर महोत्सव मनाते हैं। राधा कृष्ण की रथ यात्रा निकालते हैं। इन्होंने पूरा जीवन राधा कृष्ण के ध्यान में व्यतीत किया और ओडिशा के पुरी में महाप्रयाण (1534 में) किया।

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निमाई कैसे बने कृष्ण भक्तः 1509 में जब निमाई अपने पिता का श्राद्ध करने गया गए तो इनकी भेंट ईश्वरपुरी नाम के संत से हुई। इन्होंने निमाई को कृष्ण-कृष्ण रटने को कहा। इसके बाद ये श्रीकृष्ण भक्ति में लीन हो गए। 1510 में संत श्रीपाद केशव भारती से दीक्षा लेने के बाद इनका नाम चैतन्य महाप्रभु पड़ गया। धीरे-धीरे इनके अनुयायी बनते गए। सबसे पहले नित्यानंद प्रभु और अद्वैताचार्य महाराज शिष्य बने। इन्होंने शिष्यों के सहयोग से वाद्य यंत्रों पर नाम संकीर्तन हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे शुरू किया।


कहा जाता है गौरांग संन्यास के बाद जगन्नाथपुरी गए, यहां भगवान की मूर्ति के सामने नृत्य करते मूर्छित हो गए। यह देख सार्वभौम भट्टाचार्य इन्हें अपने घर ले गए, यहां शास्त्रार्थ हुआ। गौरांग ने भक्ति का महत्व ज्ञान से ऊपर सिद्ध किया और षडभुजरूप का दर्शन कराया। इसके बाद सार्वभौम शिष्य बन गए। ओडिशा के सूर्यवंशी सम्राट प्रताप रूद्रदेव इन्हें श्रीकृष्ण का अवतार मानते थे और इनके शिष्य बन गए थे।

चैतन्य महाप्रभु के अनमोल वचन


1. भक्ति में भावना प्रधान है, कर्मकांड तो कलेवर मात्र है। यह कहकर चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति की पवित्रता का प्रचार किया और भक्ति को आमजन तक पहुंचा दिया। आभिजात्य से लोकजीवन तक की भक्ति की इस सरल यात्रा ने तमाम निर्बलों को जीवन का आधार दिया।


2. प्रेमधन ही सार तत्व हैः चैतन्य महाप्रभु ने भक्तों को गुठली से वृक्ष बनने के उदाहरण से बताया था कि यह संसार असार है और इसके लिए किए कर्मो का भी कोई अर्थ नहीं है। केवल लोगों के कल्याण के लिए किए कार्य ही सार्थक हैं।


3. चैतन्य महाप्रभु के शिक्षाष्टक में उनकी सारी शिक्षा का सार है। उन्होंने कहा था कृष्ण नाम संकीर्तन का मुख्य फल यानी प्रेम तब मिलता है जब भक्त तृण से भी नम्र होकर वृक्ष से अधिक सहनशील होकर स्वयं निराभिमानी होकर दूसरों को मान देकर शुद्ध मन से नित्य हरिनाम संकीर्तन करे और भगवान से जीवों के प्रति प्रेम के अतिरिक्त कुछ न मांगें।