Kumbh Mela 2021 Auspicious time: जानें शाही स्नान व 6 अन्य प्रमुख स्नान की तारीखें, समय और दिन

पहला शाही स्नान 11 मार्च को, जानिए कुंभ का इतिहास व महत्व...

By: दीपेश तिवारी

Published: 08 Jan 2021, 04:28 PM IST

सनातन हिन्दू धर्म की आस्था का प्रतीक कुंभ मेला करीब माह बाद मार्च 2021 से हरिद्वार में शुरू होने जा रहा है। कुंभ मेले का सनातन हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है, और जिसके चलते इसे लेकर श्रद्धालु काफी पहले से ही काफी तैयारी शुरू कर देते हैं। कुंभ मेले में शाही स्नान का काफी महत्व होता है और अलग-अलग अखाड़ों से जुड़े संत और साधु आकर्षण का केंद्र होते हैं। इस बार हरिद्वार में लगने वाला कुंभ मेला जल्द शुरू होने वाला है और इसकी तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।

पौराणिक दृष्टिकोण से कुम्भ पर्व एवं गंगा नदी का बेजोड़ संबंध है। क्योंकि गंगा के तट पर बसे हरिद्वार और प्रयाग नगरी में महाकुंभ का आयोजन होता है। परन्तु नासिक गोमती नदी पर बसा है और इस नदी को दक्षिण की गंगा कहा जाता है।

इस महापर्व में करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि कुंभ में स्नान करने से शरीर और मन के साथ-साथ हमारी आत्मा शुद्ध हो जाती है। वहीं 6 वर्ष बाद हरिद्वार और प्रयाग नगरी में होने वाले इस पर्व को अर्द्ध कुंभ कहते हैं। इसे माघ मेला भी कहा जाता है।

कुंभ मेला हिन्दू धर्म का महापर्व है जिससे करोड़ों लोगों की आस्थाएं जुड़ी होती हैं। कुम्भ मात्र धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है बल्कि यह हमारी महान सांस्कृतिक विरासत का बोध कराता है। कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर हरिद्वार (उत्तराखंड), इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश), उज्जैन (मध्य प्रदेश) और नासिक (महाराष्ट्र) में होता है।

हरिद्वार कुंभ मेला में शाही स्नान की तारीख

- पहला शाही स्नान: 11 मार्च शिवरात्रि

- दूसरा शाही स्नान: 12 अप्रैल सोमवती अमावस्या

- तीसरा मुख्य शाही स्नान: 14 अप्रैल मेष संक्रांति

- चौथा शाही स्नान: 27 अप्रैल बैसाख पूर्णिमा

6 अन्य प्रमुख स्नान

: गुरुवार, 14 जनवरी 2021 मकर संक्रांति

: गुरुवार, 11 फरवरी मौनी अमावस्या

: मंगलवार, 16 फरवरी बसंत पंचमी

: शनिवार, 27 फरवरी माघ पूर्णिमा

: मंगलवार, 13 अप्रैल चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (हिन्दी नववर्ष)

: बुधवार, 21 अप्रैल राम नवमी।

11वें साल में कुंभ, जानिए कारण...
कुंभ मेला वैसे तो हर 12 साल बाद हरिद्वार में आयोजित होते हैं लेकिन इस बार यह 11वें साल में ही आयोजित किया जा रहा है। पौराणिक व धार्मिक व ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर 12 साल में कुंभ मेले का आयोजन होता है, लेकिन साल 2022 में गुरु, कुंभ राशि में नहीं होंगे. इसलिए इस बार 11वें साल में कुंभ का आयोजन हो रहा है। गौरतलब है कि कुंभ मेले का आयोजन ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर ही होता है। कुंभ मेले के आयोजन में सूर्य और देवगुरु बृहस्पति की अहम भूमिका मानी जाती है। इन दोनों ही ग्रहों की गणना के आधार पर कुंभ मेले के आयोजन की तिथि तय की जाती है।

कोरोना महामारीः कुंभ मेले पर असर
कुंभ मेले में इस बार कुछ ज्यादा सख्ती देखने को मिल सकती है। कोरोना महामारी के कारण कुछ नियमों का भी पालन करना होगा। साथ ही रेलवे भी विशेष ट्रेन चलाने की तैयारी कर रहा है, जिसमें यात्रा करने से पहले यात्रियों को कोविड-19 से बचने के लिए तैयार की गई गाइडलाइन का पालन करना जरूरी होगा। श्रद्धालुओं को थर्मल स्क्रीनिंग सहित अन्य आवश्यक प्रक्रियों से गुजरना होगा।

कुंभ स्नान का विशेष धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में कुंभ स्नान का विशेष धार्मिक महत्व है और कुंभ स्नान करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिल जाती है, साथ ही मोक्ष भी प्राप्त होता है। कुंभ स्नान से पितृ भी शांत होते हैं और अपना आर्शीवाद प्रदान करते हैं।

कुंभ से जुड़ी प्राचीन धार्मिक मान्यता
कुंभ के संबंध में समुद्र मंथन की कथा पौराणिक ग्रंथों में प्रचलित है। इसके अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा के शाप की वजह से स्वर्ग का वैभव खत्म हो गया, तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। विष्णुजी ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने की सलाह दी। भगवान विष्णु ने बताया कि समुद्र मंथन से अमृत निकलेगा, अमृत पान से सभी देवता अमर हो जाएंगे।

देवताओं ने ये बात असुरों के राजा बलि को बताई तो वे भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। इस मंथन में वासुकि नाग की नेती बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया था। समुद्र मंथन करने पर 14 रत्न निकले थे। इन रत्नों में कालकूट विष, कामधेनु, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रंभा, महालक्ष्मी, वारुणी देवी, चंद्रमा, पारिजात वृक्ष, पांचजन्य शंख, भगवान धनवंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले थे।

लेकिन जब अमृत कलश निकला तो सभी देवता और असुर भी उस अमृत कलश पर टूट पड़े। दोनों में युद्ध होने लगा। ऐसे में अमृत कलश से अमृत की चार बूंदें धरती पर चार स्थानों पर गिर गई। ये स्थान थे हरिद्वारस, प्रयाग, नासिक और उज्जैन। देवाताओं और असुरों में 12 साल तक युद्ध चला था, इसलिए 12 साल के अंतराल पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।

कुंभ : गंगा स्नान का महत्व...
- कुंभ में गंगा स्नान करना अमृपान के समान माना जाता है।
- कुंभ में गंगा में डुबकी लगाना अमृत स्नान होता है।
- महाकुंभ में स्नान करने से शरीर, मन और आत्मा की शु्द्धि होती है।
- कुम्भ में स्नान करने से लोगों को पापों से मुक्ति मिलती है।
- महाकुंभ में गंगा स्नान करने से हज़ारों अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है।
- कुंभ में गंगा स्नान करने से सैकड़ों वाजपेय यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है।
- कुंभ में गंगा पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश-सम्मान की प्राप्ति होती है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से महाकुंभ
पौराणिक वर्णन के अनुसार समुद्र मंथन में निकले अमृत की सुरक्षा में सूर्य, चंद्र, गुरु और शनि ने अपना विशेष योगदान दिया था। इसलिए कुंभ के आयोजन में नवग्रहों में से सूर्य, चंद्र, गुरु और शनि की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके अलावा ज्योतिष में चार स्थानों में लगने वाले महाकुंभ के कारणों को भी रेखांकित गया है, जैसे कि जब कुम्भ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुम्भ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है।

वहीं मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुम्भ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुम्भ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर महाकुंभ नासिक में होता है और सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है।

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