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Premanand Ji Maharaj : प्रशंसा है जहर, निंदा है अमृत: प्रेमानंद जी महाराज के 5 गहरे आध्यात्मिक सूत्र

Premanand Ji Maharaj : क्या आप सच में खुश हैं? प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि आत्म-कृपा के बिना जीवन अधूरा है। जानिए प्रशंसा, निंदा, ब्रह्मचर्य, साधना और जीवन के गहरे आध्यात्मिक रहस्य।

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भारत

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Manoj Vashisth

Apr 09, 2026

Premanand Ji Maharaj

Premanand Ji Maharaj : प्रशंसा सुनकर खुश मत हो… यही तुम्हें अंदर से कमजोर बना रही है (फोटो सोर्स: Gemini AI)

Premanand Ji Maharaj : आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम दूसरों पर दया करते हैं, दूसरों की मदद करते हैं, लेकिन क्या कभी आपने खुद पर कृपा की है? वृंदावन के संत श्री प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Ji Maharaj) कहते हैं कि गुरु, शास्त्र और ईश्वर की कृपा तो हम पर हमेशा बरसती है, लेकिन जब तक हम 'आत्म-कृपा' नहीं करते, तब तक परम आनंद की प्राप्ति असंभव है।

1. प्रशंसा का जहर और निंदा का अमृत

    प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं सांसारिक नियम है कि हमें अपनी तारीफ सुनना पसंद है और निंदा से हमें क्रोध आता है। लेकिन आध्यात्मिक सिद्धांत इसके बिल्कुल विपरीत है।

    अपनी प्रशंसा न करें: अपने किए गए दान, पुण्य या साधना का बखान अपने मुख से कभी न करें, वरना उनका फल नष्ट हो जाता है।

    तारीफ से बचें: यदि कोई आपकी प्रशंसा करे, तो कानों में उंगली दे दें। यह अहंकार को जन्म देती है।

    निंदा का स्वागत करें: अपनी बुराई को आनंदपूर्वक सुनें। निंदा करने वाला व्यक्ति आपके भीतर के मैल को साफ करने में मदद करता है।

    2. असली ब्रह्मचर्य और आसन की शक्ति

      प्रेमानंद जी महाराज ने युवाओं और साधकों के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही है। उनके अनुसार, बिना सिद्धासन या पद्मासन के अभ्यास के पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना लगभग असंभव है।

      प्राण संशोधन: प्रतिदिन कम से कम 48 मिनट (दो घड़ी) एक आसन में बैठने का अभ्यास करें।

      कष्ट ही अमृत है: आसन में बैठने पर नसों और नाड़ियों में जो पीड़ा होती है, वह शरीर के रोगों को नष्ट करती है और मन को एकाग्र करती है।

      3. प्रारब्ध और साधना का संघर्ष

        प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं अक्सर लोग कहते हैं कि 'हमारे भाग्य (प्रारब्ध) में दुख लिखा है, इसलिए भजन नहीं हो पा रहा।' महाराज जी इसे खारिज करते हैं। वे कहते हैं कि प्रारब्ध केवल शरीर को कष्ट दे सकता है, आपकी साधना को नहीं रोक सकता। बीमारी या विपत्ति आपके भजन में बाधा नहीं बननी चाहिए।

        4. साधुत्व: आत्म-कल्याण नहीं, जगत-कल्याण

          साधु का जीवन केवल खुद को मोक्ष दिलाने के लिए नहीं होता। प्रेमानंदमहाराज जी कहते हैं, "जिस दिन हम गुरु की शरण में आए, कल्याण तो उसी दिन हो गया। अब जो साधना है, वह जगत के मंगल के लिए है।" जैसे गुरु गोविंद सिंह जी के 'पंच प्यारों' ने बलिदान की वेदी पर खुद को समर्पित किया, वैसे ही एक साधक को अपनी वासनाओं और अहंकार की बलि देनी पड़ती है।

          5. शरीर की आसक्ति का त्याग

            यह शरीर 'मल-मूत्र' की मशीन है। इसे सजाने-संवारने में समय नष्ट न करें। महाराज जी ने प्राचीन संतों के उदाहरण दिए जो केवल जल से शरीर शुद्ध करते थे और फटे-पुराने वस्त्र (कंथा) धारण करते थे।

            सावधानी: मोबाइल जैसे आधुनिक यंत्रों का उपयोग केवल सत्संग सुनने के लिए करें, कुसंग के लिए नहीं।

            ऐतिहासिक तथ्य: लेख में 'पंच प्यारों' के साहस का उल्लेख है, जो सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना के समय चुने गए थे। यह सर्वोच्च समर्पण का प्रतीक है।

            आधुनिक संदर्भ: आज के डिजिटल युग में मानसिक व्यभिचार और समय की बर्बादी सबसे बड़ी बाधा है। महाराज जी का सुझाव है कि तकनीक का उपयोग केवल ज्ञानवर्धन के लिए हो।

            स्वास्थ्य लाभ: विज्ञान भी मानता है कि पद्मासन और सिद्धासन जैसे योगासन रक्त संचार सुधारते हैं और 'वेगस नर्व' (Vagus Nerve) को सक्रिय कर मानसिक शांति प्रदान करते हैं।

            यदि आप जवानी में तप करेंगे, तो बुढ़ापा आनंद में बीतेगा। यदि जवानी भोग में गवाई, तो अंत समय दुर्गति निश्चित है। जागें, क्योंकि आप केवल मांस का लोथड़ा नहीं, बल्कि ईश्वर के दिव्य अंश हैं।

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