
Advice to elderly people who sit in village chaupal to be alert
रीवा. लॉकडाउन के दौर में अब गांवों में भी काम-धंधे बंद हो गए हैं। खेती से जुड़ा कार्य कुछ जगह चल रहा है तो अधिकांश जगह यह भी सिमटने की कगार पर है। शहरों की तुलना में गांव का लॉकडाउन कम प्रभावी है, यहां लोग घरों से बाहर निकल रहे हैं और एक-दूसरे से बात भी कर रहे हैं। बुजुर्ग अपने पुराने अनुभव युवाओं एवं अन्य से साझा कर रहे हैं। हर जगह कोरोना से जुड़ी चर्चा ही प्रमुख रहती है। एक तो कोरोना है क्या, इस तरह पहले भी बीमारियां आई लेकिन इतनी खतरनाक नहीं थी। सरकार भी जिस तरह से इस बार सक्रिय है पहले कभी नहीं थी।
एक दो दशकों गंभीर बीमारियां आती रहती हैं
बुजुर्गों की मानें तो पहले भी हुल्की एवं बीमारियां आती थी, जिसमें बड़ी सं या में लोग प्रभावित होते थे। कोरोना से जुड़ी दूसरी प्रमुख चर्चा उन लोगों की है जो इसकी वजह दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं। हर गांव के लोग मजदूरी करने के लिए बड़े शहरों में गए हैं, जिसमें कुछ लौट आए तो वह अपनी व्यथा बता रहे हैं, वहीं जो फंसे हैं उनके बारे में भी गांव के लोग चर्चा कर रहे हैं। हर कोई उन लोगों के बारे में जानना चाहता है जो प्रतिबंध की वजह से अपने गांव नहीं लौट पाएं हैं। बात बढ़ते-बढ़ते भूत-प्रेत के किस्सों तक पहुंच रही है।
कोरोना संकट से उबरने घर पर रहना जरूरी
मऊगंज तहसील के बेलहाई खुर्द गांव में भी सभी के मन में कोरोना संक्रमण को लेकर आशंकाएं हैं। इसके बारे में गांव के लोग अधिक नहीं जानते, इसलिए पढ़े लिखे लोगों से या फिर बुजुर्गों से ही इसके बारे में पूछा जा रहा है। शिवकुमार पाठक कहते हैं ऐसा पहली बार नजारा दिखाई दे रहा है। महीने भर में गांव की रौनकता बदल गई है। यह वैवाहिक कार्यक्रमों का दौर है लेकिन सन्नाटा छाया है। अनिल पाठक, गीता देवी, रामजणि, अशोक पाठक आदि कहते हैं कि वह अफवाहों से परेशान हैं, हर कोई यह किस्सा सुनाकर चला जाता है कि आज इस गांव में कोरोना मिला, कल उस गांव में। रिश्तेदारी के लोगों से हर दिन बात कर उनके यहां का भी हाल ले रहे हैं। कुछ लोग परेशानी में हैं, दूसरे शहरों में उनके सामने विपरीत परिस्थिति आ गई है, उनके बारे में चिंता बनी रहती है।
Published on:
28 Apr 2020 01:20 am
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