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त्रेतायुग में बना था ये शिवमंदिर, भगवान विश्वकर्मा ने कराया था निर्माण, दिन में चार बार बदलता है स्वरूप

ऋृंगी ऋषि की तपस्या से खुश भगवान शिव ने दिया था वरदान, भगवान विश्वकर्मा ने एक बड़ी शिला पर कराया था निर्माण

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Devtalab's Shiv temple

Devtalab's Shiv temple

रीवा. रीवा-वाराणसी मार्ग पर स्थित देवतालाब में एक पत्थर से बना भगवान भोलेनाथ का मंदिर देखने में जितना भव्य है, उसका धार्मिक व चमत्कारिक महत्व उतना ही अधिक है। भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना के लिए यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। सावन के महीने में शिव-अभिषेक के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि महादेव के कहने पर भगवान विश्वकर्मा ने इसे एक रात में बनाया था। त्रेतायुग में बने इस मंदिर का दिव्य शिल्पकाल भी इस बात का प्रमाण है। यह पूरा मंदिर एक विशाल पत्थर पर निर्मित है। मंदिर के शिवलिंग पर एक निशान है, जो सूर्य की दिशा अनुसार बदलता रहता है। शिवलिंग का आकार भी पहर के साथ परिवर्तन होने की चर्चा है। इन दिव्य घटनाओं के कई बार प्रमाण सही साबित हुए हैं। यही कारण है कि पूरे विंध्य में देवतालाब का मंदिर प्रसिद्ध है। वर्तमान में इस मंदिर की देखदेख प्रशासन कर रहा है। प्रतिवर्ष इस मंदिर में भव्य मेला आयोजित होता है।

IMAGE CREDIT: patrika

यह है मंदिर की कहानी
मंदिर को लेकर मान्यता है कि यह ऋृंगी ऋषि की तपोस्थली थी। उन्होंने यहीं बैठकर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से खुश होकर भगवान शिवशंकर प्रगट हुए और वरदान मांगने को कहा। इस पर ऋृंगी ऋषि ने एक रात में मंदिर व शिवलिंग स्थापना का वर मांगा था। भगवान ने उनकी इच्छा अनुसार रात में ही भगवान विश्वकर्मा से एक पत्थर में दिव्य मंदिर बनवाया है। यहां तक कि सुबह होने के बाद एक मंदिर अधूरा ही रहा गया। वहीं भगवान शिव की स्थापना ज्योर्तिलिंग के रूप में हुई। इसके बाद ऋषि इस स्थल को लोगों के कल्यार्थ छोडकऱ चित्रकूट चले गए थे। वर्तमान में यह मंदिर जिले के प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों में से एक है।

धार्मिक तीर्थयात्रा मानी जाती है अधूरी
देवतालाब मंदिर शिवलिंग को लेकर मान्यता है कि इसके दर्शन के बिना तीर्थयात्रा का उद्देश्य पूरा नहीं होता। चार धाम की यात्रा से लौटकर हर श्रद्धालु देवतालाब स्थित शिवमंदिर जरूर आता है। विंध्य व आसपास के लोग अब भी तीर्थयात्रा के बाद लौटकर इस मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं और जल चढ़ाते हैं। यही कारण है कि रीवा-काशी बनारस मार्ग पर स्थित इस मंदिर में पूरे साल लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।

ऐसे पहुंचें मंदिर तक
सबसे नजदीकी हवाईअड्डा प्रयागराज में है। रीवा की प्रयागराज से दूरी लगभग 125 किमी है। रीवा-वाराणसी और जबलपुर से भी समान दूरी पर है। इन दोनों शहरों की रीवा से दूरी लगभग 250 किमी है। दिल्ली, राजकोट, इंदौर, भोपाल व नागपुर जैसे शहरों से रीवा सीधे रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। देवतालाब मंदिर, रीवा रेलवे स्टेशन से मिर्जापुर मार्ग पर लगभग 60 किमी की दूरी पर स्थित है।