
बाजार में बनाई जा रही पीआेपी की गणेश प्रतिमाएं
मप्र और छत्तीसगढ़ के कई जिलों में भेज रहे हैं मूर्ति, प्रतिबंधित होने के बावजूद बनाई जा रही लाखों की संख्या में प्रतिमाएं
प्रशासन नहीं कर रहा है कोई कार्रवाई
सागर. गणेश उत्सव 7 सितंबर से शुरू हो रहा है। घर-घर में विघ्नहर्ता की स्थापना की जाएगी। शहर में करीब 5 लाख से अधिक छोटी गणेश प्रतिमाएं बनाई जाएगी। लाखों की संख्या में बन रही ये प्रतिमाएं पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) से बनेगी। सैकड़ों कलाकार इन्हें अब अंतिम रूप देने में जुटे हैं। साथ ही थोक में प्रतिमाएं बनाकर जिले के बाहर भी बिक्री के लिए भेजी जा रही है। प्रशासन हर वर्ष गणेश उत्सव के कुछ दिन पहले ही प्रतिमाओं को प्रतिबंधित करने का प्रयास करता है, जब तक शहर में करोड़ो रुपए का कारोबार हो जाएगा। सस्ती मूर्ति मिलने की वजह से इनकी मांग ज्यादा रहती है।
शहर में इतवारी टौरी, शनीचरी, मछरयाई, बाइसा मोहल्ला, पथरिया, सुभाष नगर और मकरोनिया के अनेक स्थानों पर ये मूर्तियां बनाई जा रही है। करीब 50 से ज्यादा मूर्तिकारों के परिवार ये पीओपी की गणेश प्रतिमाएं बनाने में जुटे हैं। सागर से बड़ी संख्या में प्रतिमाओं को बनाकर छत्तीसगढ़ तक भेजा जाता है। वहीं आसपास दमोह, शाहगढ़, राहतगढ़, कटनी, गौरझामर और देवरी आदि क्षेत्रों में मूर्तियों की सप्लाई की जा रही है।
5 करोड़ से अधिक कारोबार
जानकारों के अनुसार सागर में पिछले कुछ वर्षों में लगातार पीओपी की मूर्ति बनाने का कारोबार फैलता जा रहा है। शहर में इन मूर्तियों का 5 करोड़ से अधिक का कारोबार होगा। ये मूर्ति सांचों से बनाई जाती है। मूर्तिकार हार्डवेयर विक्रेताओं से ही पीओपी खरीदते हैं। 10 किग्रा की एक बोरी 120 रुपए की आती है। इसमें लगभग 15 से 20 छोटी मूर्ति तैयार होती हैं। इन्हें अलग- अलग सांचों की डिजाइन में डालकर तैयार किया जा रहा है। इसके बाद इन पर रासायनिक रंगों से कलर किया जा रहा है। पीओपी से मूर्ति बनाने में कम समय लगता है और मिट्टी की अपेक्षा मुनाफा अधिक मिलती है।
पर्यावरण के लिए सबसे अधिक नुकसान
प्रशासन द्वारा पीओपी की मूर्ति प्रतिबंधित हैं, बावजूद मूर्तिकार हर वर्ष प्रतिमाएं बनाते हैं। लोग भी सस्ती होने की वजह से मूर्ति खरीद लेते हैं, लोगों को मूर्ति नहीं खरीदना चाहिए। पीओपी बहुत कड़क होता है और यह पानी में घुलता नहीं है, लेकिन उसे प्रदूषित कर देता है। पीओपी की मूर्तियों में रासायनिक रंगों का प्रयोग किया जाता है। पीओपी मिला पानी जब खेतों में पहुंचता है तो वहां की जमीन भी बंजर कर देता है। बड़ी संख्या में मूर्ति बनाने के बाद नदी-तलाब में विसर्जन किया जाता है, इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है।
आरपी मिश्रा, भूगोलविद
फैक्ट फाइल
50 से अधिक मूर्तिकार के परिवार बना रहे पीओपी की मूर्ति
05 लाख से ज्यादा मूर्तियों की होगी बिक्री
03करोड़ से ज्यादा का व्यापार होने का अनुमान
Updated on:
29 Aug 2024 06:07 pm
Published on:
21 Aug 2024 01:14 am

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