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अपनी मर्जी से कहां, अपने सफर के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम  हैं!

उमाकांत मिश्र ने बताया कि निदा फाजली का सागर से बहुत गहरा रिश्ता रहा है। विट्ठल भाई की किशोर समिति में आयोजित मुशायरे में वे आए थे।

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Widush Mishra

Feb 09, 2016

सागर.मशहूर शायर निदा फाजली के निधन की खबर से सागर के साहित्य जगत में भी शोक की लहर फैल गई। साहित्यकारों ने फाजली साहब का सागर से भी गहरा नाता रहा है। गीतकार वि_ल भाई पटेल, कलागुरू विष्णु पाठक, शायर अशोक मिजाज और फिल्म अभिनेता श्यामकांत मिश्र से उनकी बातचीत होती रहती थी। विष्णु पाठक ने बताया कि निदा फाजली बड़े शायर व गीतकार थे। 70 के दशक में बनी फिल्म में उन्होंने दो गीत लिखे थे। इसी दशक में वे सागर भी आए थे। फिल्म में विट्ठल भाई के गीत भी थे। मैंने भी उस फिल्म के गीत दोई दिलों को एेसे मिलालो जैसे रंग में मिले पानी रे, पार करो जिंदगानी रे की कोरियोग्राफी मैंने की थी। शहर के सभी शायरों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

आए थे मुशायरे में
उमाकांत मिश्र ने बताया कि निदा फाजली का सागर से बहुत गहरा रिश्ता रहा है। विट्ठल भाई की किशोर समिति में आयोजित मुशायरे में वे आए थे। फिल्म शायद का प्रीमियर भी सागर में हुआ था। फिल्म में सागर के स्व. शकूर खान ने भूमिका निभाई थी। साथ ही मुकेश नाम से विख्यात रहे सागर के स्व. सुधाकर आठले ने एक गीत भी गाया था। सागर के ही श्यामाकांत मिश्र भी फिल्म से जुडे़ थे।

दोस्त जगजीत के जन्मदिन पर विदा
गजल सम्राट जगजीत सिंह ने निदा की गजलों को आवाज दी। दोनों की जोड़ी बेहतरीन रही। 90 के दशक में निदा का इनसाइट एलबम जगजीत ने गाया था, जो लोकप्रिय हुआ। इसमें देश की संस्कृति, इंसानियत की बेहद सादगी भरी झलक दिखी। जगजीत ने 1999 में फिल्म सरफरोश में निदा की नज्म....होश वालों को खबर क्या गाया, जो काफी लोकप्रिय है। दिवंगत जगजीत का सोमवार को जन्मदिन (8 फरवरी) था और इसी दिन निदा दुनिया को अलविदा कह गए।

समंदरों का मिजाज की लिखी थी भूमिका
शायर अशोक मिजाज ने बताया कि निदा फाजली से मेरा परिचय 1994 में हुआ था। उनके साथ मैंने करीब एक दर्जन मुशायरे पढ़े हैं। मेरा पहला गजल संग्रह समंदरों का मिजाज की भूमिका उन्होंने ही लिखी है। वे बड़े मृदुल स्वभाव के थे। तरन्नुम और तबस्सुम उनके होंठों पर हमेशा रहा करती थी। साहित्यकार डॉ. शरद सिंह ने कहा कि उर्दू-हिंदी की गंगा-जमुनी साहित्यिक परंपरा के शायर निदा फाजली को यूं खो देना दुखद है। डॉ. वर्षा सिंह ने कहा कि हरदिल अजीज शायर निदा फाजली के निधन का समाचार पाकर दुख हुआ यह साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है।

अपनी मर्जी से कहां अपने सफर के हम हैं रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हैं।।
पहले हर चीज थी अपनी मगर अब लगता है, अपने ही घर में किसी दूसरे के हम हैं।।
वक्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों तक, किसको मालूम कहां के हैं किधर के हम हैं।।
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब, सोचते रहते हैं कि किस राहगुजर के हम हैं।।
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम, हर कलमकार की बेनाम खबर के हम हैं।।
अपनी खुशी है ना कोई गम रुलाने वाला, हमने अपना लिया हर रंग जमाने वाला।।
उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था, सारा घर ले गयार घर छोड़ के जाने वाला।।
इक मुसाफिर के सफर जैसी है सब दुनिया, कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला।।
एक बेचेहरा सी उम्मीद है चेहरा-चेहरा जिस तरफ देखिए आने को है आने वाला।।