
देखरेख के अभाव में नष्ट हो रही पुरा संपदा
गौरझामर की विरासत आज भी याद दिलाती है गौडवाना शासन काल की
गौरझामर. ग्राम में गोंडवाना शासकों के समय का किला पुरातत्व विभाग की देखरेख के अभाव में संवर नहीं पा रहा है। इस किले की पुरा संपदा यहां-वहां बिखरी पड़ी है।
संपदा के कुछ अंश या तो समय के साथ नष्ट हो रहे हैं या असमाजिक तत्वों के द्वारा नुकसान पहुंचाया जा चुका है। बुजुर्ग बताते हैं कि यहां कभी राजदरबार लगता थे। न्याय होता था। रास रंग के साथ दरबार में कविताएं और घुंघुरुओं की झनकार भी सुनाई देती थी।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 52 गढ़ों में से एक गढ़ गौरझामर को पूर्व में ऊजरगढ़ के नाम से जाना जाता था। यहां गौंडवाना का राज हुआ तब ऊजरगढ़ से इसका नाम गौड़झामर हो गया। गुलाम भारत में अंग्रेजी शासन काल के दौरान इस नगर का नाम गौरझामर पड़ गया। गौंड शासन काल में तब इस रियासत के राजा दुर्गा सिंह झांसी के युद्ध के समय इस वंश के अंतिम राजा रतन सिंह गौंड थे। जिनका नाम ओरछा के शिलालेख पर दर्ज है। गौरझामर के हदय स्थल में करौंजुआ नदी के तट पर बने किले की कई किवदंतियां समाई हैं। आज यह किला प्राचीन वैभव राजदरबार गौंड शासन काल की स्मृति संजोए है।
किले के चारों दिशाओं में चार कुएं, बाबडी हैं जो आज भी अथाह जल से भरी हैं। किले के अंदर एक गुप्त मार्ग भी है जो यहां से करैंजुआ एवं सुनार नदी के नीचे से भूमिगत होकर अनीराबाबा की पहाडी तक जाता है।
किले की चार.पॉच वर्ष पूर्व मरम्मत पुरातत्व विभाग द्वारा कराई गई थी लेकिन इसे और भी सजाने.संवारने की दरकार है, ताकि बुंदेलखंड का गौरव बरकरार रहे। हालांकि पुरातत्व विभाग ने जो अवशेष मिट्टी में दब गये थे उन्हें निकालकर सुरक्षा के लिए एक कर्मी तैनात किया गया है। ताकि कुछ हद तक देखरेख हो सके।
Published on:
19 Mar 2020 04:07 pm
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