
खेतों में पराली में आग लगाने की घटनाएं लगातार सामने आ रहीं हैं। जिला प्रशासन द्वारा किसानों से की जा रही अपील काम नहीं आ रही है। प्रत्येक निकाय की फायर ब्रिगेड को रोज आधा दर्जन इवेंट आ रहे हैं। फायर वाहन खेतों में दौड़ रहे हैं। वहीं इस साल जिला प्रशासन एफआइआर की कार्रवाई में भी लापरवाह बना हुआ है। रविवार को नगर निगम की फायर ब्रिगेड को सीहोरा, बिहारीपुरा सहित 5 से अधिक जगहों पर पराली में लगी आग को बुझाने कॉल गया। फायर वाहन पूरे दिन यहां से वहां दौड़ते रहे।
फसल कटाई के लिए मजदूर नहीं मिलते।
हार्वेस्टर से कम समय समय लगता है।
पराली से भूसा बनाने में लागत अधिक आती है।
भूसा बनाने वाली स्ट्रॉ रीपर मशीनों की कम उपलब्धता।
फसल के अवशेष बोवनी के समय परेशान करते हैं।
बीते वर्ष पराली जलाने की प्रशासन के पास करीब 1600 घटनाएं ही दर्ज की गईं हैं, जिसमें करीब 80 एफआइआर दर्ज हुईं और पौने तीन लाख रुपए जुर्माना भी वसूला गया था। इस वर्ष जिला प्रशासन के पास कोई आंकड़ा ही नही है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. आशीष त्रिपाठी ने बताया कि रवाई में आग लगाने से मिट्टी का तापमान 60 डिग्री तक पहुंच जाता है। इससे जमीन में स्थित सूक्ष्म जीव, पोषक तत्व, कार्बन, नाइट्रोजन आदि नष्ट हो जाते हैं। भूमि की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने वाले कीट मित्र भी खत्म हो जाते हैं और ईको सिस्टम पूरी तरह से नष्ट हो जाता है। सही दिशा में प्रयास होने के बाद भी एक साल की अवधि में भी पहले जैसा ईको सिस्टम नहीं बन पाता है।
इस सीजन जिले में 3 लाख 33 हजार हेक्टेयर में गेहूं की फसल लगी थी। करीब 80 प्रतिशत रकबा की कटाई हार्वेस्टर से की गई है। अक्सर इन्हीं खेतों में किसान नरवाई में आग लगा रहे हैं, जो तापमान तो बढ़ा रहे हैं, साथ ही वायु प्रदूषण भी हो रहा है।
Updated on:
27 Apr 2026 04:52 pm
Published on:
27 Apr 2026 04:51 pm
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