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दुनिया की नजरों से छिपा रखी है पत्थर की दुर्लभ नाव और सूर्य घड़ी, जानिए क्या है वजह

म्यूजियम में अव्यवस्था के हालात

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boat of stone

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सागर. शहर में स्थापित पुरातत्व संग्रहालय एेतिहासिक विरासत को समेटे हुए है। यहां ६वीं सदी से 18वीं सदी तक की पुरा महत्व की बेशकीमती पत्थर की प्रतिमाएं व अन्य सामग्री महफूज हैं। यहां एकमुखी शिवलिंग, दुर्लभ पत्थर की नाव के साथ ही सूर्य घड़ी भी मौजूद है। प्रचार-प्रसार के अभाव में इसकी जानकारी लोगों तक नहीं पहुंच पा रही। पिछले माह संग्रहालय में आयोजित किए गए शिवलिंगम् महोत्सव में भी लोगों की ना के बराबर उपस्थिति रही। बहरहाल शहर के बीचो बीच पुरानी डफरिन अस्पताल के भवन स्थित संग्रहालय को प्रचार की दरकार है।

अलग-अलग हिस्सों में रखी है घड़ी
संग्रहालय में मौजूद पत्थर की सूर्य घड़ी 17वीं शताब्दी की बताई जा रही है। पर्याप्त व्यवस्थाएं न होने के कारण तीन हिस्सों में बांटकर इसे रखा गया है। समय पट्टिका के साथ लगे कांटे को ताला लगाकर स्टोर रूम में कैद करके रखा गया है। 1989 तक यह घड़ी कलेक्टर बंगले में रखी थी। बाद में उसे संग्रहालय में रखा गया था। घड़ी का प्रयोग सूर्य की दिशा से समय का ज्ञान करने के लिए किया जाता था। इन्हीं घडिय़ों के आधार पर आधुनिक घडि़यों का अविष्कार हुआ। भारत में प्राचीन वैदिक काल से सूर्य घडिय़ों का प्रयोग होता रहा है। घड़ी को पत्थर के बड़े स्तंभ के स्टैंड पर रखा जाता है। पृथ्वी के घूमने के साथ जमीन पर पड़ी स्तंभ की छाया से समय का अनुमान लगाया जाता था। दोपहर के समय स्तंभ की छाया सबसे छोटी होती थी। इससे पता चलता था कि सूर्य ठीक आकाश के बीच में स्थित है।

तैरती है पांच किलो की पत्थर की नाव
सं ग्रहालय में ही एक पत्थर की नाव भी स्टोर रूम में रखी हुई है। पांच किलो वजनी इस नाव का निर्माण 19वीं शताब्दी में होना बताया जा रहा है। नाव को बाहर रखने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। इसीलिए इसे अंदर रखा गया है। 36 सेमी लंबी इस नाव की ऊंचाई व चौड़ाई 7 सेमी है। यह नाव 800 ग्राम वजन भी ढो सकती है।

सूर्य घड़ी और पत्थर की नाव की स्थिति को देखकर संग्रहालय में बाहर ऐसे स्थान पर रखने का प्रयास किया जा रहा है, जहां लोग आसानी से देख सकें, निकट भविष्य में पुरातत्व विभाग का एक सेमिनार प्रस्तावित है। इसी दौरान इन्हें प्रदर्शित किया जाएगा।
पीसी महोबिया, पुरातत्ववेत्ता