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बंजर जमीन उगल रही ‘कीमती दाने’: सागर में ढूंढने उमड़ी भीड़, कीमत 25 हजार तक होने का दावा

Mysterious Beads Found: 15 दिनों से मोतीनुमा 'कीमती दाने' की चाह में सुबह से शाम तक खुदाई कर रहे ग्रामीण, मुगलकालीन होने का दावा, खरीदार भी सक्रिय।
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mysterious beads found in barren land, मोतीनुमा कीमती दाने ढूंढने में जुटे लोग (Source-patrika)

Sagar Mysterious Beads Found: कहते हैं किस्मत कब और कहां बदल जाए, कोई नहीं जानता। ऐसा ही कुछ इन दिनों मध्यप्रदेश के सागर जिले के केसली विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम जैतपुर डोमा में देखने को मिल रहा है। यहां की एक बंजर पड़ी जमीन अचानक से ग्रामीणों के लिए 'कुबेर का खजाना' बन गई है। जमीन से कथित तौर पर कीमती माला के दाने निकलने की अफवाह और दावों के बाद पिछले दो हफ्तों से पूरा गांव इसी बंजर जमीन पर डेरा डाले हुए है। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी सुबह से शाम तक मिट्टी छानकर अपनी किस्मत चमकाने में जुटे हैं।

देखें वीडियो-

दावा- हाथों-हाथ बिक रहे दाने, 25000 तक मिल रही कीमत

स्थानीय ग्रामीणों के दावों के मुताबिक, अब तक गांव के करीब 10 से अधिक लोगों के हाथ यह रहस्यमयी कीमती दाने लग चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन दानों को खरीदने के लिए मौके पर ही बिचौलिए और खरीदार भी सक्रिय हो चुके हैं। दानों की चमक और बनावट के आधार पर उनकी बोलियां लगाई जा रही हैं, जो 1000 से शुरू होकर 25,000 तक पहुंच रही हैं। नकद भुगतान मिलने के कारण ग्रामीणों में इन्हें खोजने की होड़ और ज्यादा बढ़ गई है। बारिश के इस सीजन में जब खेतों में रोजगार के सीमित साधन हैं, तब यह बंजर जमीन ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त कमाई का बड़ा जरिया बन गई है।

मुगलकाल से जोड़ा जा रहा है संबंध

यह कौतूहल पहली बार नहीं देखा जा रहा है। इलाके के जानकारों का कहना है कि इससे पहले देवरी के सिलारी और केसली के ही मदनपुर गांव में भी इसी तरह के प्राचीन दाने मिलने के मामले सामने आ चुके हैं। बुजुर्गों और ग्रामीणों का अनुमान है कि ये बेशकीमती दाने मुगलकालीन हो सकते हैं, जिनका इस्तेमाल प्राचीन समय में राजा-महाराजाओं की मालाएं बनाने में किया जाता होगा। हालांकि, इन दानों को खरीदने वाले स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि वे इन्हें आगे बड़े शहरों में बेच देते हैं, लेकिन इनका अंतिम उपयोग किस काम में होता है, इसकी पुख्ता जानकारी उन्हें भी नहीं है।

(नोट- इन दानों की वास्तविक प्रकृति, कीमत और ऐतिहासिक महत्व की अभी तक किसी सरकारी एजेंसी या पुरातत्व विशेषज्ञ द्वारा पुष्टि नहीं की गई है।)