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त्याग का भाव नहीं अपनाने से हम संसार में भटक रहे हैं : ऐलक दयासागर

उत्तम त्याग के अवसर पर ऐलक दयासागर ने कहा कि जीव के भावों में जब त्याग समाहित होता है तो वह मोक्ष मार्ग में आगे बढऩे लगता है और यदि राग द्वेष के परिणाम जब अधिक होने लगते हैं तो समझो वह अपना संसार और लंबा कर रहा होता है।

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सागर

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Rizwan ansari

Sep 05, 2025

आचार्य विद्यासागर के शिष्य ऐलक दयासागर के सानिध्य में मकरोनिया के नेहानगर दशलक्षण पर्व मनाया धूमधाम से मनाया जा रहा है। गुरुवार को पर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग के अवसर पर ऐलक दयासागर ने कहा कि जीव के भावों में जब त्याग समाहित होता है तो वह मोक्ष मार्ग में आगे बढऩे लगता है और यदि राग द्वेष के परिणाम जब अधिक होने लगते हैं तो समझो वह अपना संसार और लंबा कर रहा होता है। अनादिकाल से हमने त्याग के भावों को नहीं अपनाया है इसीलिए आज तक हम संसार में भटक रहे हैं । दानी और कंजूस का अंतर बताते हुए एक उदाहरण बताया। ऐलक ने कहा कि दानी को मजा आता है खाने और खिलाने में और कंजूस को मजा आता है कमा कमा कर मर जाने में। दानी अपने कमाए हुए द्रव्य का सदुपयोग करते हैं लेकिन कंजूस अपने द्वारा कमाए हुए द्रव्य को ना स्वयं ही उपयोग कर पाते हैं और ना ही अच्छे कार्यों में उसे दान ही कर पाते हैं। ऐलक ने कहा कि व्यक्ति अदालत की मार से भले ही बच जाए लेकिन कर्मों की मार से नहीं बच सकता है इसलिए परिणाम हमेशा निर्मल रखना चाहिए। संग्रह की प्रवृत्ति को छोड़ कर दान की प्रवृत्ति को अपना चाहिए। मुनि सेवा समिति सदस्य मनोज जैन लालो ने बताया की प्रतिदिन सुबह 7 बजे से श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, ऐलक महाराज के प्रवचन एवं तत्वार्थ सूत्र का वचन किया जा रहा है।