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Independence Day 2021 शहीद-ए-आजम भगत सिंह की ये अंतिम शायरी सुन भर आएंगी आपकी आंखें, देखें वीडियो

Independence day 2021 शहीद -ए- आजम भगत सिंह ने 3 मार्च 1931 को जो अंतिम पत्र में लिखा था उसमें उन्हाेंने उर्दू शायरी में लिखा था कि मैं सुबह के उस दीपक के समान हूं जो दिन निकलने पर बुझ जाएगा।

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शहीद-ए-आजम भगत सिंह

शिवमणि त्यागी, सहारनपुर

''कोई दम का मेहमां हूं अहले महफिल, चिराग-ए-सहर हूं बुझा चाहता हूं''

(Independence Day 2021 ) शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने अपने अंतिम पत्र में ये लाइने लिखी थी। फांसी के फंदे काे चूमने से पहले उन्हाेंने अपने पिता काे अंतिम पत्र लिखा था जिसमें उन्हाेंने खुद की तुलना सुबह के उस दीपक से की थी जो दिन का उजाला होते ही बुझ जाता है। अपने इसी पत्र में उन्हाेंने यह भी लिखा था कि ''खुश रहो अहले वतन, हम तो सफर करते हैं''

सहारनपुर की आवास विकास कालोनी में रहने वाले भगत सिंह के भतीजे किरणजीत सिंह संधु बताते हैं कि शहीद-ए-आजम बेहद खुशमिजाज थे और हमेशा खुश रहते थे। फांसी के फंदे को चूमने से पहले उन्होंने अपना अंतिम पत्र लिखा था जिसे पढ़कर पिताजी कुलतार सिंह जी की आंखे नम हो गई थी। पत्र में उन्होंने अंतिम मुलाकात का जिक्र ( Independence Day 2021 Quotes ) करते हुए लिखा था कि 'प्रिय कुलतार आपकी आंखों में आंसू देखकर बहुत दुख हुआ, आपकी बातों में बहुत दर्द था हौंसले से रहना और खूब पढ़ाई करना। इसी पत्र में उन्होंने लिखा था ''कोई दम का मेहमां हूं अहले महफिल, चिराग-ए-सहर हूं बुझा चाहता हूं, यानी मैं कुछ क्षणों का मेहहमान हूं और सुबह के उस दीपक की तरह हूं जो दिन निकलेगा तो बुझ जाएगा। ''मेरी हवा में रहेगी ख्याल की बिजली, ये मुस्तेखाक है फानी रहे ना रहे'' यानी ये शरीर तो मुट्ठीभर राख है रहे ना रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मेरे विचार जिंदा रहेंगे और जैसे बादलों में बिजली कौंधती है चमक देती है उस तरह से मेरे विचार भी आने वाली पीढ़ी को रवानी देते रहेंगे'' खुश रहो एहले वतन हम तो सफर करते हैं''

सन्धु बताते हैं कि भगत सिंह को पढ़ने का बहुत शौक था और वह क्रांतिकारियों की किताबें भी पढ़ा करते थे। उन्होंने ब्रिटिश अदालत में कभी भी अपने लिए वकील खड़ा नहीं किया। अपने मुकदमों को वह खुद ही लड़ा करते थे। एक सवार के जवाब में किरणजीत सिंह संधु बताते हुए कि शहीद-ए- आजम भगत सिंह ने ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना नहीं की थी जहां पर जातिवाद और धर्म की खाई हो। भगत सिंह हमेशा सामाजिक एकता वाला स्वतंत्र भारत चाहते थे। वह ऐसा आजाद भारत देखना चाहते थे जहां सामाजिक समरसता हो और जात-पात का भेदभाव ना हो।

मजिस्ट्रेट को कहे थे ये शब्द
किरणजीत सिंह संधु बताते हैं कि जब शहीद-ए-आजम को फांसी के फंदे पर ले जाया जा रहा था तो उस समय उन्होंने हंसते हुए ब्रिटिश मजिस्ट्रेट को कहा था 'मिस्टर मजिस्ट्रेट आप बहुत भाग्यशाली हैं आप इस बात के गवाह बनेंगे कि हिन्दुस्तान के नौजवान सिर्फ ऊंचे आदर्शों की बात नहीं करते वो हंसते-हंसते अपने उसूलों के लिए प्राण दे सकते हैं आपके इसके आज भागीदार बनेंगे।


कभी हथियारों और क्रांति की बात नहीं करते थे भगत सिंह
युवा पीढ़ी भले ही भगत सिंह को क्रांतिकारियों के रूप में जानती हो लेकिन कि किरणजीत सिंह संधु बताते हैं कि भगतसिंह कभी भी हथियारों और क्रांति की बात नहीं करते थे। वह हमेशा कहते थे कि किसी भी लड़ाई को बम और तलवारों से नहीं लड़ा जा सकता बल्कि क्रांति की तलवार विचारों की शान पर तेज होती है। वह पढ़ने के बहुत शौकीन थे और हमेशा किताबें पढ़ते रहते थे। जब उन्हे फांसी के लिए बुलाया गया तो उस समय भी वह एक क्रांतिकारकी की किताब पढ़ रहे थे। जेल में भी उन्होंने कई किताबें पढ़ी। आज की युवा पीढ़ी के लिए शहीद ए आजम नजीर हैं। युवा पीढ़ी को उनके नक्शे कदम पर चलना चाहिए और खुश रहते हुए पढ़ने की आदत डालनी चाहिए।

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