
chanakya niti ke satva adhyay me kya likha gaya hai
सतना। चाणक्य नीति के सातवें अध्याय के पहले श्लोक में स्त्री और पैसों से जुड़ी हुई कुछ बातें बताई गई है। जैसे बुद्धिमान पुरुष धन के नाश को, मन के संताप को, गृहिणी के दोषो को, किसी धूर्त ठग के द्वारा ठगे जाने को और अपमान को किसी से नहीं कहते। आचार्य चाणक्य के अनुसार पति-पत्नी के जीवन से जुड़ी कई ऐसी बातें जिनको गुप्त रखने में ही भलाई है।
क्योंकि स्त्री और पैसों से जुड़ी हुई बातें किसी ओर को बता देने के बाद से चौतरफा परेशानियों का अंबार खड़ा हो जाता है समाज में हर जगह बुराई होने लगती है। इसलिए विपरीत परिस्थितियों में भी किसी को नहीं बताने में ही समझदारी रहती है। इनसे साथ ही चाणक्य ने मन की स्थिति के बारे में भी बताया है कि जब दुखी होते हैं तो किसी को बताना नहीं चाहिए।
सातवें अध्याय के 10 श्लोक
1- बुद्धिमान पुरुष धन के नाश को, मन के संताप को, गृहिणी के दोषो को, किसी धूर्त ठग के द्वारा ठगे जाने को और अपमान को किसी से नहीं कहते।
2- धन और अन्न के लेनदेन में, विद्या ग्रहण करते समय, भोजन और अन्य व्यवहारों में संकोच न रखने वाला व्यक्ति सुखी रहता है।
3- शांत चित्त वाले संतोषी व्यक्ति को संतोष रूपी अमृत से जो सुख प्राप्त होता है, वह इधर-उधर भटकने वाले धन लोभियों को नहीं होता।
4- अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनो में संतोष रखना चाहिए और विद्या अध्ययन, तप और दान करने-कराने में कभी संतोष नहीं करना चाहिए।
5- दो ब्राह्मणों के बीच से, अग्नि और ब्राह्मण के बीच से, पति और पत्नी के बीच से, स्वामी और सेवक के बीच से तथा हल और बैल के बीच से नहीं गुजरना चाहिए।
6- पैर से अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गौ, कन्या, वृद्ध और बालक को कभी नहीं छूना चाहिए।
7- बैलगाड़ी से पांच हाथ, घोड़े से दस हाथ, हठी से हजार हाथ दूर बचकर रहना चाहिए और दुष्ट पुरुष (दुष्ट राजा) का देश ही छोड़ देना चाहिए।
8- हाथी को अंकुश से, घोड़े को चाबुक से, सींग वाले बैल को डंडे से और दुष्ट व्यक्ति को वश में करने के लिए हाथ में तलवार लेना आवश्यक है।
9- ब्राह्मण भोजन से संतुष्ट होते है, मोर बादलों की गर्जन से, साधु लोग दूसरों की समृद्धि देखकर और दुष्ट लोग दुसरो पर विपत्ति आई देखकर प्रसन्न होते है।
10- अपने से शक्तिशाली शत्रु को विनयपूर्वक उसके अनुसार चलकर, दुर्बल शत्रु पर अपना प्रभाव डालकर और समान बल वाले शत्रु को अपनी शक्ति से या फिर विनम्रता से, जैसा अवसर हो उसी के अनुसार व्यवहार करके अपने वश में करना चाहिए।
चाणक्य नीति श्लोक
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च ।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत॥1॥
भावार्थ
- धन का नाश हो जाने पर, मन में दुखः होने पर, पत्नी के चाल–चलन का पता लगने पर, नीच व्यक्ति से कुछ घटिया बातें सुन लेने पर तथा स्वयं कहीं से अपमानित होने पर अपने मन की बातों को किसी को नहीं बताना चाहिए।
- चाणक्य ने इसी तरह पत्नी के बारे में भी महत्वपूर्ण बात कही है कि जब किसी को अपनी पत्नी के चरीत्र संबंधी किसी बात पर शंका हो या उसकी कोई आदत गलत लगे तो ये बात किसी भी इंसान से शेयर नहीं करनी चाहिए।
- चाणक्य ने ये भी कहा है कि कहीं से अपमानित होने पर या कोई नीच, मुर्ख व्यक्ति आपको गलत बात बोल दे तो इसकी चर्चा भी दूसरों से नहीं करनी चाहिए। इसी में समझदारी है।
Published on:
04 Dec 2018 06:07 pm

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