
Eagles Day Special: Only 200 vultures in Satna district
सतना। जिले में गिद्धों के रहवास और वृद्धि के लिए वन विभाग द्वारा तमाम कवायद की जा रही है। इसके बावजूद सतना में मात्र 200 गिद्ध बचे हैं। दो प्रजाति रेड हेड वल्चर व व्हाइट बैक्ड वल्चर विलुप्त की कागार पर हैं। जिले में इनकी संख्या क्रमश: 18 व 07 है।
उल्लेखनीय है, कुछ समय पहले गिद्ध झुंडों में नजर आते थे। अब दिखाई नहीं देते हैं। वन विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में तीन प्रजाति के कुल २०० गिद्ध हैं। अधिकतर गिद्ध रामनगर के गिद्धा पहाड़ के आसपास दिखाई देते हैं।
व्हाइट बैक्ड वल्चर मौजूद
जानकारों के अनुसार एक दशक पहले 7 तरह के गिद्ध दिखते थे। इस समय गिद्धों में रेड हेड वल्चर, इजिप्शियन वल्चर व व्हाइट बैक्ड वल्चर मौजूद हैं। इनमें व्हाइट बैक्ड वल्चर दहाई की संख्या में भी नहीं बचे। पन्ना सहित अन्य जगहों से प्रवास पर आने वाले गिद्धों ने कई साल पहले ही जिले से तौबा कर लिया था।
पौराणिक कथाओं से जुड़ा
वन रेंज अमरपाटन के रामनगर में मौजूद गिद्धा पहाड़ को गिधैला या गिद्धकूट पर्वत के नाम से जाना जाता है। इस पहाड़ की पहचान गिद्धों से जुड़ी है। स्थानीय जनश्रुतियों में इस पहाड़ को पौराणिक कथाओं से भी जोड़ा गया है। यहां किसी समय गिद्ध की बहुतायत संख्या होने के चलते इसे रामायण काल के जटायू व सम्पाती का स्थल बताया जाता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि सतना जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर है। यह पर्वत गिद्धों के आश्रय का पुराना ठिकाना है। वर्तमान में यहां करीब 200 गिद्ध डेरा जमाए हैं।
धरी रह गई संरक्षण की रणनीति
विलुप्त की कगार पर पहुंच चुके गिद्ध को बचाने प्रदेश सरकार ने बीते साल दो चरण में राज्यव्यापी गणना कराई थी। तब जिले में 200 गिद्ध गिने गए थे। संकलित जानकारी एवं गणना के आंकड़ों के आधार गिद्ध एटलस तैयार किया गया था। इस एटलस के आधार पर गिद्ध और गिद्ध आवास स्थलों के संरक्षण की रणनीति भी बनाई गई थी जो मैदान पर नहीं उतर पाई।
जिले में महज तीन गिद्ध आवास
गिद्धों की गणना के दौरान उनके आवासों का चिह्नाकन किया गया था। जिले में 10 वन रेंजों में महज दो रेंज में गिद्ध आवास मिले थे। अमरपाटन रेंज के गिद्धा पहाड़ व उचेहरा के परसमनिया के अलावा कहीं भी घोसले नहीं मिले। चौंकाने वाली बात यह रही कि पन्ना नेशनल पार्क से लगे सिंहपुर रेंज में एक भी गिद्ध नजर नहीं आया।
क्यों घटे गिद्ध
जानकारों के अनुसार, मवेशियों के इलाज में कुछ दवाएं लंबे समय तक उपयोग की गईं। जिनके चलते मांस व हड्डियां खाने से गिद्धों के लीवर व किडनी में संक्रमण हुआ और इनकी मौत हुई। हालांकि ऐसी दवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। उधर, गिद्ध सालभर में केवल एक अंडा देते हैं। इस कारण उनकी संख्या धीमी गति से बढ़ती है।
परसमनिया में दस साल बाद नजर आए गिद्ध-चील
गिद्धों के लुप्तप्राय होने के बीच एक अच्छी खबर है। इन दिनों उचेहरा रेंज के परसमनिया के आसपास गांव में चील व गिद्ध नजर आ रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे पिथौराबाद निवासी बाबूलाल दाहिया ने बताया कि परसमनिया की तलहटी अतरबेदिया खुर्द गांव में चील-गिद्धों का एक झुण्ड हाल ही में नजर आया। गिद्ध इतने दुर्लभ हो चुके हैं कि ग्रामीण भी दस-पंद्रह साल से नहीं देख पाए हैं।
Published on:
10 Jan 2018 11:16 am
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