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गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं की संभावना

मनौरा की धरोहर को राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित करने की कवायद

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Satna Online

Jun 21, 2015

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मैहर

मनौरा में खुदाई से प्राप्त गुप्तकालीन अवशेष दूसरी धरोहरों की तरह संरक्षित करने की पहल होगी। पुणे और प्रदेश के पुरातत्व विशेषज्ञों को, मिल रहे महत्वपूर्ण अवशेषों से गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं की संभावना भी नजर आ रही है।


पहला मंदिर उदयगिरी में


देश और प्रदेश के करीब एक दर्जन से अधिक स्थानों पर गुप्तकालीन मंदिर, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और दूसरे अवशेष प्राप्त हो चुके हैं। पहला मंदिर उदयगिरी में मिला है। मंदिर चट्टानें काट कर और अधों सृजनात्मक तरीके से बनाया गया था। सांची के मंदिर राष्ट्रीय मानचित्र में है। दशावतार मंदिर देवगढ़, विष्णु मंदिर तिगवा जबलपुर, विष्णु मंदिर ऐरन जबलपुर, पार्वती मंदिर नचना कोठारा, शिव मंदिर भूमरा, भीतरगांव कानपुर, ब्रीक टेंपल, मुर्कदरा टेंपल कोटा, अही छतरा टेंपल यूपी को भीतक राष्ट्रीय मानचित्र में दर्ज कराया जा चुका है। इसमें मनौरा का जिक्र नहीं था।


मूर्ति शिल्प की विशेषता


विशेषज्ञों के अनुसार, गुप्तकाल को स्वर्णिम युग माना जाता है। इस दौर में मंदिर और प्रतिमाओं का निर्माण बड़े पैमाने पर किया गया। शुरुआत में प्रतिमा, मंदिर, स्तंभों का स्वरूप कम अलंकृत था। लेकिन, बाद में अधिक अलंकृत किया जाने लगा। गुप्तकाल में ऐसा समय भी आया जब प्रतिमाओं को अलंकृत कर जान फूंकने की कोशिश की थी।


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विष्णु के हाथ में कमल

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प्रतिमाओं के चेहरे मुस्कुराहट भरे, अर्धखुले होंठ। आंख, घुंघराले बाल वाले होते हैं। भगवान विष्णु के हाथ में कमल का पाया जाना सबसे बड़ी विशेषता है। देव प्रतिमाओं के पीछे प्रभा मंडल, विष्णु के आयुध मानव रूप में गुप्तकाल से ही नजर आए। प्रतिमाएं प्रलम्ब अवस्था में मिलीं।

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