मैहर देवी के मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 1063 सीढिय़ां तय करनी पड़ती हैं। हालांकि अब मां शारदा प्रबंध कमेटी द्वारा रोप-वे बनवाने से यह कठिनाई दूर हो गई है। आल्हा-उदल को वरदान देने वाली मां शारदा देवी को पूरे देश में मैहर की शारदा माता के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक कहानियां
मां शारदा की उत्पत्ति के पीछे एक पौराणिक कहानी है। बताया जाता है कि सम्राट दक्ष प्रजापति की पुत्री सती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं। लेकिन, राजा दक्ष शिव को भगवान नहीं, भूतों और अघोरियों का साथी मानते थे। वे इस विवाह के पक्ष में नहीं थे। फिर भी सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर भगवान शिव से विवाह कर लिया। एक बार राजा दक्ष ने एक यज्ञ कराया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन जान-बूझकर भगवान महादेव को नहीं बुलाया।
राजा दक्ष ने शिव को किया था अपमानित
महादेव की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती इससे बहुत आहत हुईं। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से भगवान शिव को आमंत्रित न करने का कारण पूछा। इस पर दक्ष प्रजापति ने भरे समाज में भगवान शिव के बारे में अपशब्द कहा। तब इस अपमान से पीडि़त होकर सती मौन होकर उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठ गईं और भगवान शंकर के चरणों में अपना ध्यान लगाकर योग मार्ग द्वारा वायु तथा अग्नि तत्व को धारण कर अपने शरीर को अपने ही तेज से भस्म कर दिया।
जब खुली थी क्रोध में तीसरी नेत्र
भगवान शंकर को जब इसका पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया और यज्ञ का नाश हो गया। भगवान शंकर ने माता सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठा लिया और गुस्से में तांडव करने लगे। ब्रह्मांड की भलाई के लिए भगवान विष्णु ने ही सती के अंग को बावन भागों में विभाजित कर दिया।
जहां आभूषण गिरे वहीं शक्ति पीठों का निर्माण
जहां-जहां सती के शव के विभिन्न अंग और आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। उन्हीं में से एक शक्तिपीठ है मैहर देवी का मंदिर। यहां मां सती का हार गिरा था। मैहर का मतलब है, मां का हार, इसी वजह से इस स्थल का नाम मैहर पड़ा। अगले जन्म में सती ने हिमाचल राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिवजी को फिर से पति रूप में प्राप्त किया।