5 फ़रवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सवाई माधोपुर

रणथम्भौर: शिकारियों का गढ़ बन रही खण्डार व फलौदी रेंज

सबसे अधिक शिकार के मामले आए सामने

Google source verification

सवाईमाधोपुर. रणथम्भौर में भले ही वन विभाग की ओर से वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए 60 करोड़ की लागत का ई- सर्विलांस सिस्टम लगाया गया हो और विभाग वन्यजीवों की सुरक्षा के कितने ही दावे कर रहा हो लेकिन हकीकत इससे कुछ अलग ही नजर आ रही है। आलम यह है कि रणथम्भौर की खण्डार व फलौदी रेंज तो अब शिकारियों का गढ बनती जा रही है। पिछले पांच सालों में बाघ से लेकर सांभर, चीतल, हरिण, जंगली ***** आदि वन्यजीवों के सबसे अधिक शिकार के मामले रणथम्भौर की फलौदी व खण्डार रेंज से ही सामने आए हैं हालांकि कुछ मामलोंं में वन विभाग ने आरोपियों को गिरफ्तार भी किया है लेकिन अभी भी कई मामलों में आरोपी वन विभाग की पकड़ से दूर है।
फलौदी व खण्डार रेंज से ही सबसे अधिक लापता है बाघ बाघिन
रणथम्भौर में पूर्व में 26 बाघ बाघिनों के लापता होने का मामला विधानसभा तक पहुंच चुका है। इनमें से अधिकतर बाघ बाघिन रणथम्भौर की खण्डार व फलौदी रेंज से ही लापता हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार इनमें बाघ टी-42 यानि फतेह, टी-20 यानि झूमरू, टी-62 टी-77, टी-78, टी-81 आदि कई बाघ बाघिन तो रणथम्भौर की खण्डार व फलौदी रेंज से ही गायब हुए थे।
सर्दियों में अधिक होती है शिकार की घटनाएं
रणथम्भौर में अब हुई शिकार की वारदातों पर नजर डाले तो साफ तौर पर कहा जा सकता है कि रणथम्भौर में सर्दियों के मौसम में शिकारी अधिक सक्रिय हो जाते हैं। खासकर दिसम्बर से लेकर मार्च के महिनों में शिकार के मामले अधिक सामने आते हैं। जानकारों की माने तो सर्दियों में रणथम्भौर में पर्यटन सीजन पीक पर रहता है। बड़ी संख्या में देशी विदेशी पर्यटक यहां भ्रमण के लिए आते हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि वन अधिकारियों का अधिक ध्यान जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा के बजाय पर पर्यटन और वीआईपी पर्यटकों के सैर सपाटे पर ही रहता है। ऐसे में शिकार की घटनाओं में इजाफा हो रहा है।
दूसरे राज्य व अन्य जिलों के शिकारियों की भी रहती है नजर
हाल ही में खण्डार रेंज में किए गए सांभर के शिकार में गिरफ्तार की गई महिला आरोपी ने पूछताछ ूमें मांस को मध्यप्रदेश, आसपास के गांवों व अन्य जिलों में बेचने की बात कबूल की है। ऐसे में स्पष्ट होता है कि रणथम्भौर में होने वाली अधिकतर शिकार की वारदातों का संबंध स्थानीय लोगों के साथ-साथ पड़ौसी राज्य मध्यप्रदेश से भी है। मध्यप्रदेश की सीमा रणथम्भौर की खण्डार रेंज से लगती है। ऐसे में शिकारी आसानी से शिकार के लिए मध्यप्रदेश से आकर रणथम्भौर के जंगल में दाखिल हो जाते है साथ ही बड़ी आसानी से वारदात को अंजाम देकर वापस एमपी की ओर लौट जाते हैं। पूर्व में भी रणथम्भौर की फलौदी रेंज में सर्दियों के मौसम में जनवरी माह में ही दो मादा चीतलों के शिकार का मामला भी सामने आ चुका है। इसके अलावा दिसम्बर 2020 में फलौदी रेंज में बाघ टी-108 के गले में लोहे का तार का फंदा फंस गया था। बाघ के गले में लोहे के तार की फोटो वन विभाग के फोटो ट्रैप कैमरे में कैद हुई थी। इसके बाद हरकत मेें आए वन विभाग की टीम ने बाघ को टे्रकुंलाइज कर उसका उपचार किया था।

स्थानीय लोगों का प्राप्त है संरक्षण
मध्यप्रदेश व प्रदेश के बूंदी, कोटा आदि जिलोंं से भी शिकारियों के शिकार के लिए रणथम्भौर आने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। रणथम्भौर की फलौदी रेंज की सीमा बूंदी जिले के समीप है और बूंदी के रास्ते आसानी से कोटा भी पहुंचा जा सकता है। सूत्रों की माने तो शिकारियों का नेटवर्क काफी लम्बा व मजबूत होता है। शिकारी शिकार करने के लिए रणथम्भौर बाघ परियोजना के आसपास बसे गांवों के लोगों से भी संपर्क करते है और फिर स्थानीय लोगों की मदद से शिकार की वारदातों को अंजाम देते है।
इनका कहना है…
पूछताछ में वन्यजीवों के मांस को मध्यप्रदेश में बचेने की बात सामने आई है। ऐसे में शिकारियों के तार मध्यप्रदेश से जुड़े होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। मामले में पूछताछ व अनुसंधान जारी है। जल्द ही अन्य आरोपियों को भी गिरफ़्तार किया जाएगा। जहां तक खण्डार व फलौदी में अधिक शिकार की वारदात का सवाल है तो अधिकतर मामलों में विभाग की ओर से त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। शिकार की वारदातों पर अंकुश लगाने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
– विष्णु गुप्ता, क्षेत्रीय वनाधिकारी, खण्डार।

बड़ी खबरें

View All

सवाई माधोपुर

राजस्थान न्यूज़