सिवनी. कहते हैं जहां चाह वहां राह। माता-पिता डायबिटिक पेसेंट थे इसलिए आलू नहीं खा पा रहे थे। हालांकि उनकी इच्छा हमेशा आलू खाने की थी। बेटे ने उनकी इच्छा पूरी करने के लिए लोगों से जानकारी जुटाई और फिर छिंदवाड़ा की जमीन पर काले आलू की खेती कर डाली। काले आलू में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा काफी कम होती है। डायबिटिक पेसेंट इसे चाव से खा सकते हैं। विपिन कहते हैं कि अब हमारे माता-पिता को आलू से परहेज नहीं करना पड़ेगा। विपिन मौर्या ने बताया कि उनका उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में ससुराल है। सास-ससुर भी डायबिटिक पेसेंट हैं। वे भी आलू बहुत चाव से खाते हैं। कुछ लोगों ने उन्हें काला आलू खाने का सुझाव दिया। इसके बाद सास-ससुर ने काला आलू खाना शुरु किया। इससे डायबिटिक भी कंट्रोल में रहा और मनपसंद आलू भी खाने को मिल रहा है। सास-ससुर ने प्रयागराज में ही काला आलू की खेती कराना शुरु कर दिया। देखते ही देखते काला आलू की प्रसिद्धी दूर-दूर तक फैल गई। अब वे अपने लिए ही नहीं लोगों के लिए भी काला आलू उगा रहे हैं। नोएडा तक उनके खेत का काला आलू जा रहा है। विपिन ने बताया कि उनके माता-पिता भी डायबिटिक पेसेंट है। इसलिए छिंदवाड़ा में भी उन्होंने काला आलू खेती करने की सोची। धर्मटेकड़ी के पास आधा एकड़ खेत में काला आलू उगाया है। खर्चा महज 10 हजार रुपए आया है। दिसंबर माह में फसल बोई थी जो मार्च तक तैयार हो जाएगी। विपिन कहते हैं कि पहली बार छिंदवाड़ा की धरती पर काला आलू की खेती का प्रयोग किया है जो सफल हो गया है। मां-बाप की इच्छा तो पूरी होगी ही साथ ही कई डायबिटिक पेसेंट भी इससे लाभ ले सकेंगे।
भा रहा छिंदवाड़ा का वातावरण
विपिन ने बताया कि छिंदवाड़ा का वातावरण काला आलू की खेती के लिए प्रतिकूल है। महज डेढ़ माह में ही फसल लहलहा रही है। संभवत: सिवनी, छिंदवाड़ा एवं आसपास के जिले में काला आलू की खेती अब तक किसी ने नहीं की है। उन्होंने बताया कि काला आलू के फायदे यह हैं कि यह बहुत कम मीठे होते हैं और स्वास्थ्य भी सही रहता है। तीन से चार माह में तैयार हो जाता है। उन्होंने बताया कि अब मैं भविष्य में इसे रोजगार का जरिया बनाऊंगा और लाखों रुपए कमाऊंगा। विपिन ने गोबर खाद ही प्रयोग किया है।