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Doctors day: गरीब मरीज का भी नि:स्वार्थ करते हैं इलाज, किराए के लिए भी दे देते हैं पैसे

71 वर्षीय डॉ. हरी प्रकाश पटेरिया सेवानिवृत्त होने के बाद भी इलाज कर रहे हैं। 20 साल पहले उल्टी, दस्त की समस्या बहुत होती थी।
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1 जुलाई को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय डॉक्टर्स डे

सिवनी. जब जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष चल रहा होता है, तब डॉक्टर ही वह शख्स होता है जो अपनी विद्या, अनुभव और अथक प्रयासों से मरीज को नया जीवन देने की कोशिश करता है। यही कारण है कि हमारे समाज में डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप कहा जाता है।

सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर

1 जुलाई को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय डॉक्टर्स डे उन सभी चिकित्सकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जो दिन-रात अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए लोगों की जान बचाते हैं। चाहे महामारी हो, सडक़ दुर्घटना, आपदा या कोई गंभीर बीमारी। डॉक्टर हर परिस्थिति में सेवा के लिए तैयार रहते हैं। एक डॉक्टर केवल दवाइयां नहीं देता, बल्कि मरीज और उसके परिवार को उम्मीद, विश्वास और हौसला भी देता है। कई बार अपनी निजी परेशानियों और परिवार से दूर रहकर भी वह दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए निरंतर कार्य करता है। आज चिकित्सा क्षेत्र आधुनिक तकनीकों से लगातार आगे बढ़ रहा है, लेकिन डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास का रिश्ता आज भी सबसे महत्वपूर्ण है। हमारे जिले में ऐसे कई डॉक्टर हैं जिनकी नि:स्वार्थ सेवा देखकर लोग उनके कायल हैं। इन्हीं में से एक हैं छपारा निवासी 71 वर्षीय डॉ. हरी प्रकाश पटेरिया जो शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी लोगों का इलाज कर रहे हैं। अगर किसी मरीज के पास फीस न भी हो तो उन्हें देखने से मना नहीं करते। दवा का पैसा न हो तो उन्हें पैसे भी दे देते हैं।

मरीज तक पहुंचना भी होता था चुनौती
छपारा निवासी सेवानिवृत्त डॉ. प्रकाश पटेरिया ने बताया कि एमडी करने के बाद वर्ष 1983 में शासकीय सेवा में शिशु रोग विशेषज्ञ के रूप में ज्वाइन किया। इसके बाद कई जगह स्थानांतरण हुआ। वर्ष 2020 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी घर में मरीजों को देखते हैं। जितना संभव होता है वे चिकित्सा जन सेवा कर रहे हैं। उन्होंने बताया पहले संक्रामक बीमारी ज्यादा होती थी, लेकिन अब बदलती जीवन शैली ने कई बीमारियों को जन्म दे दिया है। 20 साल पहले उल्टी, दस्त की समस्या बहुत होती थी। उस समय एक डॉक्टर के लिए न केवल मरीज का इलाज करना बल्कि मरीज तक पहुंचना भी बड़ी चुनौती थी। जिले में कई क्षेत्र ऐसे थे जहां पहुंच पाना आसान नहीं होता था। नदी, नाला पार करके छह से सात किमी पैदल चलकर मुश्किल से मरीज तक पहुंचते थे। जब तक मरीज ठीक नहीं हो जाता था तब तक वहीं रहते थे। उस समय आवागमन के साधन कम थे। आज मरीज डॉक्टर तक पहुंच रहा है।

समर्पण का भाव देखने को मिलता है कम
डॉ. प्रकाश कहते हैं अब के अधिकतर डॉक्टरों में समर्पण का भाव कम देखने को मिलता है। अब डॉक्टर समय पर अस्पताल पहुंचता है और समय पर वापस घर चला जाता है। जबकि हम लोग कभी यह सोचते भी नहीं थे। जब तक मरीज ठीक नहीं हो जाता था तब तक घर नहीं लौटते थे। घर पहुंच भी गए तो मन में यह उलझन होती थी। पहले अनुभव के आधार पर डॉक्टर इलाज करते थे। क्लिनिकल सेंस पहले ज्यादा रहता था, लेकिन अब जांच पर इलाज निर्भर होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि मेरा यह मानना है कि पैसा जरूरत है, लेकिन सबकुछ पैसा नहीं है। डॉ. प्रकाश के दो बेटी एवं एक बेटा भी डॉक्टर हैं। उन्होंने बताया कि घर का माहौल ऐसा था कि बच्चों ने खुद ही यह निर्णय लिया कि वे डॉक्टर बनेंगे। मैंने उन्हें भी यही सीख दी है कि वे नि:स्वार्थ भाव से लोगों का इलाज करें।