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सिवनी

वैनगंगा का महत्व पुराणों में वर्णित

गीता परा भक्ति मंडल के तत्वावधान में वैनगंगा का किया पूजन अभिषेक

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सिवनी. पुण्य सलिला वैनगंगा का महत्व पुराणों में वर्णित है। गंगाजल पीने से वैकुंठ की प्राप्ति होती है। सिवनी से दो-दो गंगा प्रवाहित हो रही है। सिवनी में वैनगंगा शिवजी की जटा से गंगा निकलने का प्रतीक है। उक्ताशय की बात शंकराचार्य महाराज के शिष्य पूज्य ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप ने वैनगंगा गंगा उद्गम स्थल मुंडारा की धर्मसभा में व्यक्त किया।
गुरुवार एकादशी के अवसर पर गीता परा भक्ति मंडल के तत्वावधान में आयोजित भगवान भोले शंकर तथा पवित्र पुण्य सलिला वैनगंगा का पूजन अभिषेक पूज्य ब्रह्मचारी के पावन सानिध्य में संपन्न हुआ। विधि विधान से अभिषेक के पश्चात मुंडारा मंदिर प्रांगण में गीता पाठ किया गया। इस अवसर पर धर्म सभा में ब्रह्मचारी ने वैनगंगा का महत्व बताते हुए कहा कि पुराणों में वर्णित कथा है कि भंडाक देश के धर्मात्मा राजा बैन हमेशा भगीरथ गंगा स्नान को जाते थे। वरदवस्था में शारीरिक कठिनाई होने पर राजा में गंगा से प्रार्थना की मैं हमेशा की तरह गंगा स्नान करता रहूं ऐसा वरदान दीजिए। तब गंगाजी ने स्वयं प्रकट होकर कहा कि राजन तुम अपने कमंडल में जल भरकर ले जाओ जहां भी कमंडल से जल पृथ्वी पर बहेगा मैं वहीं प्रकट हो जाऊंगी।
कमंडल में जल लेकर राजा अपने देश चला रास्ते में विश्राम करने रुकने पर संयोग से कमंडल गिर जाने पर वहीं से गंगा की धारा बहने लगी। वह स्थान सिवनी जिले के मुंडारा के नाम से जाना जाता है। इससे दुखी राजा द्वारा पुन: गंगाजी की प्रार्थना करने पर गंगाजी ने सांत्वना देते हुए कहा कि सिवनी में गुप्त रूप से भगवान शिव का निवास है मैं सिवनी की परिक्रमा करके तुम्हारे देश की राजधानी भंडारा पहुंचेगी। सिवनी के उद्गम स्थल मुंडारा से लखनवाड़ा मुंगवानी, दिघोरी, छपारा होते हुए बालाघाट के रास्ते वैनगंगा भंडारा पहुंचती है। तथा 641 किलोमीटर का सफर तय करके वैनगंगा दक्षिण की गंगा गोदावरी से मिलकर बंगाल की खाड़ी में भगीरथ गंगा के साथ समुद्र में मिल जाती है।
ब्रह्मचारी ने गंगा के उद्गम की सिवनी में प्रचलित आदिवासी आख्यान सुनाते हुए कहा कि आदिवासी युवक युवती वनी और गंगा के पवित्र प्रेम का परिचायक भी माना जाता है। पवित्र गंगा के महाप्रभाव हमारे गुरुवर शंकराचार्य महाराज हैं। सिवनी का यह सौभाग्य है कि यहां एक नहीं दो-दो गंगा प्रभाहित हो रही है। एक वन गंगा की धारा एवं दूसरी ज्ञान गंगा के रूप में शंकराचार्य की वाणी एवं उपदेश है। धर्मसभा के पश्चात प्रसाद के रूप में उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालु नरनारियों को फलाहार व्यंजन परोसा गया। ब्रह्मचारी ने इस पवित्र उद्गम स्थल पर हमेशा धार्मिक आयोजन करते रहने का आह्वान किया है।