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घुमंतू परिवार के बच्चों तक नहीं पहुंच रहा शिक्षा का उजियारा

- शासन की योजनाओं और दावों की खुल रही पोल

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घुमंतु परिवारों से संपर्क कर किया प्रेरित।

घुमंतु परिवारों से संपर्क कर किया प्रेरित।

सिवनी. खानाबदोश जिंदगी गुजारने वाले परिवार अपने गांव-घर को छोडक़र शहर और गांव-गांव परिवार के साथ घूमते ठिकाना बदलते रहते हैं। ऐसे में इनके बच्चे शिक्षा से नहीं जुड़ पाते। इन बच्चों को शिक्षा देने के लिए शासन योजना बनाकर राशि खर्च तो कर रही है, लेकिन हकीकत में योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिल पा रहा है। ऐसी ही स्थिति जिले में अलग-अलग जगह ठिकाना बनाकर रह रहे घुमंतु परिवारों से चर्चा में सामने आई है।
शाजापुर, बैतूल जिले के घुमंतु परिवारों के आधा सैकड़ा सदस्यों का एक जत्था पिछले कुछ महीनों से सिवनी-मंडला रोड पर भोमा और ईंदावाड़ी गांव के बीच सडक़ के किनारे मैदान पर डेरा जमाए हुए हैं। जब यहां शिक्षा विभाग के विकासखण्ड साक्षरता समन्वयक संतोष सूर्यवंशी व सहयोगी शिक्षक पहुंचे, तो उन्होंने इन घुमंतु परिवार के सदस्यों और बच्चों से मुलाकात किया। घुमंतु परिवार के लोगों ने जो हकीकत बताई, उससे साक्षरता समन्वयक भी योजना और व्यवस्था पर चिंता जाहिर कर रहे हैं।


घुमंतु परिवार के लोगों का कहना है कि बातें तो बहुत होती हैं, लोग कहते हैं कि बच्चों को पढ़ाओ, लेकिन कैसे पढ़ाएं, बहुत अधिक समय तक हम एक जगह ठहर नहीं सकते, क्योंकि हमारे पास रोजगार की समस्या है, हम घूम-घूमकर प्लास्टिक के बर्तन बेचकर या कुछ दूसरे काम करके अपने परिवारों का भरण-पोषण करते हैं। इन परिवारों ने जो बातें कही, उससे तो यही बात सामने आई कि घुमंतु परिवारों के शिक्षा की सुध लेने केंद्र से लेकर राज्य सरकारें विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लाखों करोड़ों रुपए बच्चों को शिक्षित करने के लिए खर्च कर रही है। इसके बाद भी देश-प्रदेश और जिले में ऐसे घुमंतु परिवार आज भी शिक्षा की रोशनी से वंचित हैं।


नजदीकी स्कूल में पढ़ सकते हैं ये बच्चे
नवीन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात को प्रमुखता से शामिल किया गया है कि वर्ष २०२८ तक सभी निरक्षरों को साक्षर किया जाएगा। इस लक्ष्य को सामने रखकर नवभारत साक्षरता अभियान चलाया जा रहा है। वहीं यह भी प्रावधान है कि जो परिवार घुमंतु श्रेणी के हैं। ऐसे परिवार जितने दिन भी एक क्षेत्र में ठहरते हैं, उनके बच्चों को नजदीकी प्राथमिक शाला में बैठाकर पढ़ाया जा सकता है। इस दौरान उन बच्चों को जरूरी सुविधाएं भी प्रदान की जाएंगी।


इनका कहना है -
मैंने सडक़ से आते-जाते देखा कि खुले मैदान पर टेंट लगाकर कई बच्चे और महिला-पुरूष रह रहे हैं। इनसे मिलकर बात किया, तो पता चला कि 12-13 बच्चे हैं। जो शाजापुर, बैतूल व अन्य जगह गांव में रहने के दौरान पढ़ते थे, लेकिन यहां परिवार के साथ रहने के कारण स्कूल से दूर हो गए हैं। फिलहाल ये बच्चे पढ़ाई से वंचित हैं। इनको कुछ किताबें उपलब्ध कराई हैं, जिसको पाकर बच्चे काफी खुश हैं। ये परिवार जब तक वहां हैं, यदि वे चाहें तो पास के स्कूल में बच्चे पढऩे जा सकते हैं। लेकिन परिवार के पुरुषों ने कहा कि अगले कुछ दिनों में यहां से वापस अपने गांव चले जाएंगे।

संतोष सूर्यवंशी, विकासखण्ड साक्षरता समन्वयक सिवनी