
trible women
शहडोल. मातृ-शिशु मृत्युदर में गिरावट लाने की दिशा में सरकार भले ही हरसंभव प्रयास कर रही है लेकिन मैदानी हकीकत एकदम विपरीत है। आला अफसरों की मॉनीटरिंग में कमी और मैदानी कर्मचारियों की अनदेखी का नतीजा ये है कि महिलाएं गर्भकाल में ही एनीमिया का शिकार हो रहीं हैं। जिले के आदिवासी अंचलों में एनीमिया प्रसूताओं के लिए काल साबित हो रहा है। एनीमिया की चपेट में आने के बाद प्रसूताओं की मौत हो रही है। जिले में हर माह 5 प्रसूताओं की मौत हो रही है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 15 माह में अप्रैल 2017 से लेकर अब तक 71 प्रसूताओं ने दम तोड़ा है। डॉक्टरों की जांच में पता चला है कि जिन प्रसूताओं की मौत हुई, उनमें से अधिकतर एनिमिक थीं। ऐसा भी नहीं है कि प्रसूताओं की हो रही मौत को लेकर आला अफसरों को जानकारी नहीं है। कई मर्तबा प्रसूताओं की लगातार हो रही मौत मुद्दा उठता है लेकिन कागजी कार्रवाई पूरी कर पल्ला झाड़ लिया जाता है।
सिर्फ जिला अस्पताल में ४९ मौत
पिछले १५ माह में ७१ प्रसूताओं की मौत हुई है। इसमें सिर्फ जिला अस्पताल के आंकड़ों पर नजर डालें तो ४९ प्रसूताओं की मौत हुई है। विभागीय जानकारी के अनुसार 2017- 18 में 59 गर्भवती महिलाओं की मौत हुई है। जिला अस्पताल में 44 की मौत हुई है।2018- 19 में जून तक 12 प्रसूताओं की मौत हुई है।अधिकांश ब्लॉक से रेफर होकर जिला अस्पताल पहुंचीं थीं। शहडोल के अलावा उमरिया, अनूपपुर, डिंडौरी के साथ छत्तीसगढ़ के जनकपुर तक की प्रसूताएं भी शामिल हैं।
20 हजार से ज्यादा प्रसूताएं एनीमिक
ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं के भयावह हालात हैं। आदिवासी अंचलों में आंगनबाडिय़ों से गर्भवती महिलाओं तक पोषण आहार नहीं पहुंच पाता है। स्वास्थ्य विभाग का मैदानी अमला कागजों में रिकार्ड तैयार कर लेता है। स्थिति यह है कि पिछले एक साल में स्वास्थ्य विभाग ने गर्भवती महिलाओं की जांच की। जिसमें 20 हजार से ज्यादा गर्भवती महिलाएं एनिमिक मिलीं। कई महिलाएं अधिकांश एनीमिया की चपेट में मिली हैं। डॉक्टरों की मानें तो अधिकांश प्रसूताओं की मौत एनीमिया की चपेट में आने की वजह से हो रही है।
शुरू नहीं हुए वेंटिलेटर, भटकते हैं परिजन
संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल होने के बाद भी यहां वेंटीलेटर की सुविधा नहीं है। अस्पताल प्रबंधन ने वेंटीलेटर से जुड़ी कीमती मशीनें तो मंगा ली हैं लेकिन कई साल बीतने के बाद भी शुरू नहीं किया जा सका है। स्थिति यह है कि प्रसूताओं को जरूरत पडऩे पर वेंटीलेटर ही नहीं मिल पाता। कई मर्तबा ग्रामीण अंचलों की महिलाओं को रेफर कर दिया जाता है, तो कई प्रसूताओं को निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। इसके अलावा अन्य रोगों के इलाज के लिए भी मरीजों को वेंटीलेटर नहीं मिल पाता है, जिससे परिजनों को काफी असुविधाओं का सामना करना पड़ता है।
प्रसूताओं की मौत की लगातार समीक्षा कर रहे हैं। वेंटीलेटर के संबंध में अस्पताल प्रबंधन को बताएंगे।
डॉ. राजेश पांडेय, सीएमएचओ
मातृ शिशु मृत्युदर में गिरावट लाने का प्रयास कर रहे हैं। लगातार समीक्षा कर रहे हैं। जल्द सुधार होगा।
अनुभा श्रीवास्तव, कलेक्टर
Published on:
05 Jul 2018 02:18 pm
बड़ी खबरें
View Allशहडोल
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
