
पांच दिन बैगाओं का फाग, देते हैं बलि
शहडोल। चकाचौंध और चमक-धमक के बीच आदिवासी समुदाय आज भी अनूठी होली मनाते हुए प्रकृति को सहेजने की परंपरा कायम रखा है। आदिवासी समुदाय दहन और होली से पहले प्रकृति को न्यौता देता है। इतना ही नहीं, सेमर की डाल काटने से पहले बैगा बाबा पूजा-अर्चना करते हुए अनुमति लेता है। इसके बाद पेड़ की डाल काटी जाती है। होली के दिन देवी को खुश करने के लिए बलि देने की भी परंपरा है। आदिवासी समुदाय पिछले कई दशकों से प्रकृति को सहेजने की परंपरा निभाते आ रहा है। सभी युवा और बुजुर्ग एकत्र होकर ढोलक, मजीरा, नगरिया, मांदर लेकर घर-घर मे फाग गाते बजाते हैं। शहडोल संभाग के आदिवासी अंचलों में पूरा आदिवासी समुदाय आज भी प्रकृति से बने रंगों का ही इस्तेमाल करते हैं। पलास और छुइला के फूल को कूचकर पानी मिलाकर रंग बनाया जाता है। हर घर के मालिक उनके स्वागत मे नारियल-रोरी, भांग, महुआ रस देते हैं। यह फाग 13 दिन तक चलता है और होली दो दिन के अलावा बुढ़वा मंगल के दिन खेली जाती है। समुदाय में आज से होली शुरू हो जाएगी और आने वाले मंगलवार तक खेली जाएगी।
पूरे गांव एकजुट होकर बैगा बाबा को देता है अनुमति
आदिवासी अंचल अंकुरी और कंचनपुर के ग्रामीणों के अनुसार, सबसे पहले होली के लिए गांव के बैगा बाबा को बुलाया जाता है। बैगा बाबा होली गाडऩे कि पुस्तैनी स्थान में सभी को ले जाते है और होली गाडऩे की पूजा शुरू होती है। होलिका दहन के कई दिन पहले विशेष मुहुर्त में बैगा बाबा द्वारा सबसे पहले सेमर के पेड़ को न्योता दिया जाता है। सेमर के पेड़ की पूजा चावल हल्दी अगरबत्ती नारियल से किया जाता है। इसके बाद सेमर के पेड़ से अनुमति लेकर पेड़ का एक डाल काट लिया जाता है। इसका उपयोग होलिका दहन में करते हैं। इसके अलावा बाकी लकडिय़ां पेड़ों से काटने की बजाय घरों से जुटाते हैं। ग्रामीण बताते हैं पेड़ काटकर क्षति नहीं पहुंचाते हैं। पेड़ों से टूटी और गिरने वाली लकडिय़ों का ही उपयोग दहन में करते हैं।
कुल देवता और पूर्वजों के लिए देते हैं बलि
बैगा बाबा के सेमर की डाल काटने के बाद बास(भीरा) के पेड़ को न्यौता दिया जाता है। सेमर की तरह बास की पूजा किया जाता है और अनुमति के बाद पतला भीरा के छड़ी काट लिया जाता है। दोनों पेड़ के डाल को लेकर पुस्तैनी स्थान पर लेजाते है और विशेष पूजा होती है। बुजुर्ग कहते है होली में घर से लकड़ी और चावल होली और देवी को अर्पित करते हैं। होली के दिन पूर्वजों और कुल देवता कि पूजा की जाती है। इसके अलावा मुर्गा, करेनी मुर्गा, तिसाला बरहा, पूर्वजों के लिए बलि चढ़ाया जाता है।
प्रकृति को क्षति न पहुंचाते हुए पूरा समुदाय दशकों से होली की इस परंपरा को निभाते आ रहा है। होली में बलि देकर पूर्वक और कुल देवता को खुश किया जाता है। प्रकृति को नुकसान न पहुंचे, इसलिए जंगल से लकड़ी सिर्फ एक व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है, जिसे बैगा बाबा कहते हैं। ये बैगा बाबा विशेष पूजा के बाद अनुमति लेकर सेमर की पेड़ से एक डाल काटता है।
शिवनंदन बैगा, कंचनपुर
होली में प्रकृति को भी हम न्यौता देते हैं। लकड़ी जिंदा पेड़ से नहीं काटते हैं। टूटी और पेड़ों से गिरी हुई लकडिय़ों का उपयोग ही करते हैं। कुछ घरों में एकत्रित लकडिय़ों को मांग लिया जाता है।
दीनदयाल सिंह, सरपंच अंकुरी
Published on:
10 Mar 2020 08:00 am
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